Sunday, 20 August 2017

เคชौเคฐाเคฃिเค• เค•เคฅाเคँ : เค“เคฎ्เค•ाเคฐेเคถ्เคตเคฐ เค•ी เค•เคฅा

                    पौराणिक कथाएँ

                ओम्कारेश्वर की कथा

एक बार मुनिश्रेष्ठ नारद ऋषि घूमते हुए गिरिराज विन्ध्य पर पहुँच गये। विन्ध्य ने बड़े आदर-सम्मान के साथ उनकी विधिवत पूजा की। ‘मैं सर्वगुण सम्पन्न हूँ, मेरे पास हर प्रकार की सम्पदा है, किसी वस्तु की कमी नहीं है’- इस प्रकार के भाव को मन में लिये विन्ध्याचल नारद जी के समक्ष खड़ा हो गया। अहंकारनाशक श्री नारद जी विन्ध्याचल की अभिमान से भरी बातें सुनकर लम्बी साँस खींचते हुए चुपचाप खड़े रहे। उसके बाद विन्ध्यपर्वत ने पूछा- ‘आपको मेरे पास कौन-सी कमी दिखाई दी? आपने किस कमी को देखकर लम्बी साँस खींची?’

नारद जी ने विन्ध्याचल को बताया कि तुम्हारे पास सब कुछ है, किन्तु मेरू पर्वत तुमसे बहुत ऊँचा है। उस पर्वत के शिखरों का विभाग देवताओं के लोकों तक पहुँचा हुआ है। मुझे लगता है कि तुम्हारे शिखर के भाग वहाँ तक कभी नहीं पहुँच पाएंगे। इस प्रकार कहकर नारद जी वहां से चले गए। उनकी बात सुनकर विन्ध्याचल को बहुत पछतावा हुआ। वह दु:खी होकर मन ही मन शोक करने लगा। उसने निश्चय किया कि अब वह विश्वनाथ भगवान सदाशिव की आराधना और तपस्या करेगा। इस प्रकार विचार करने के बाद वह भगवान शंकर जी की सेवा में चला गया। जहाँ पर साक्षात ओंकार विद्यमान हैं। उस स्थान पर पहुँचकर उसने प्रसन्नता और प्रेमपूर्वक शिव की पार्थिव मूर्ति (मिट्टी की शिवलिंग) बनाई और छ: महीने तक लगातार उसके पूजन में तन्मय रहा।

वह शम्भू की आराधना-पूजा के बाद निरन्तर उनके ध्यान में तल्लीन हो गया और अपने स्थान से इधर-उधर नहीं हुआ। उसकी कठोर तपस्या को देखकर भगवान शिव उस पर प्रसन्न हो गये। उन्होंने विन्ध्याचल को अपना दिव्य स्वरूप प्रकट कर दिखाया, जिसका दर्शन बड़े – बड़े योगियों के लिए भी अत्यन्त दुर्लभ होता है। सदाशिव भगवान प्रसन्नतापूर्वक विन्ध्याचल से बोले- ‘विन्ध्य! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। मैं अपने भक्तों को उनका अभीष्ट वर प्रदान करता हूँ। इसलिए तुम वर माँगो।’ विन्ध्य ने कहा- ‘देवेश्वर महेश! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो भक्तवत्सल! हमारे कार्य की सिद्धि करने वाली वह अभीष्ट बुद्धि हमें प्रदान करें!’ विन्ध्यपर्वत की याचना को पूरा करते हुए भगवान शिव ने उससे कहा कि- ‘पर्वतराज! मैं तुम्हें वह उत्तम वर (बुद्धि) प्रदान करता हूँ। तुम जिस प्रकार का काम करना चाहो, वैसा कर सकते हो। मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।’

भगवान शिव ने जब विन्ध्य को उत्तम वर दे दिया, उसी समय देवगण तथा शुद्ध बुद्धि और निर्मल चित्त वाले कुछ ऋषिगण भी वहाँ आ गये। उन्होंने भी भगवान शंकर जी की विधिवत पूजा की और उनकी स्तुति करने के बाद उनसे कहा- ‘प्रभो! आप हमेशा के लिए यहाँ स्थिर होकर निवास करें।’ देवताओं की बात से महेश्वर भगवान शिव को बड़ी प्रसन्नता हुई। लोकों को सुख पहुँचाने वाले परमेशवर शिव ने उन ऋषियों तथा देवताओं की बात को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिया।

वहाँ स्थित एक ही ओंकारलिंग दो स्वरूपों में विभक्त हो गया। प्रणव के अन्तर्गत जो सदाशिव विद्यमान हुए, उन्हें ‘ओंकार’ नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार पार्थिव मूर्ति में जो ज्योति प्रतिष्ठित हुई थी, वह ‘परमेश्वर लिंग’ के नाम से विख्यात हुई। परमेश्वर लिंग को ही ‘अमलेश्वर’ भी कहा जाता है। इस प्रकार भक्तजनों को अभीष्ट फल प्रदान करने वाले ‘ओंकारेश्वर’ और ‘परमेश्वर’ नाम से शिव के ये ज्योतिर्लिंग जगत में प्रसिद्ध हुए।

Friday, 11 August 2017

เคชौเคฐाเคฃिเค• เค•เคฅाเคँ : เคธोเคฎเคจाเคฅ เค•ी เค•เคฅा

                 पौराणिक कथाएँ

                सोमनाथ की कथा

प्रजापति दक्ष ने अपनी सभी सत्ताइस पुत्रियों का विवाह चन्द्रमा के साथ कर दिया, तो वे बहुत प्रसन्न हुए। पत्नी के रूप में दक्ष कन्याओं को प्राप्त कर चन्द्रमा बहुत शोभित हुए और दक्षकन्याएँ भी अपने स्वामी के रूप में चन्द्रमा को प्राप्त कर शोभायमान हो उठी। चन्द्रमा की उन सत्ताइस पत्नियों में रोहिणी उन्हें सबसे ज्यादा प्रिय थी, जिसको वे विशेष आदर तथा प्रेम करते थे। उनका इतना प्रेम अन्य पत्नियों से नहीं था। चन्द्रमा की अपनी तरफ उदासीनता और उपेक्षा का देखकर रोहिणी के अलावा बाकी दक्ष पुत्रियां बहुत दुखी हुई।  वे सभी अपने पिता दक्ष की शरण में गयीं और उनसे अपने कष्टों का वर्णन किया।

अपनी पुत्रियों की व्यथा और चन्द्रमा के दुर्व्यवहार को सुनकर दक्ष भी बड़े दुःखी हुए। उन्होंने चन्द्रमा से भेंट की और शान्तिपूर्वक कहा- ‘कलानिधे! तुमने निर्मल व पवित्र कुल में जन्म लिया है, फिर भी तुम अपनी पत्नियों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करते हो। तुम्हारे आश्रय में रहने वाली जितनी भी स्त्रियाँ हैं, उनके प्रति तुम्हारे मन में प्रेम कम और अधिक, ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों है? तुम किसी को अधिक प्यार करते हो और किसी को कम प्यार देते हो, ऐसा क्यों करते हो? अब तक जो व्यवहार किया है, वह ठीक नहीं है, फिर अब आगे ऐसा दुर्व्यवहार तुम्हें नहीं करना चाहिए। जो व्यक्ति आत्मीयजनों के साथ विषमतापूर्ण व्यवहार करता है, उसे नर्क में जाना पड़ता है।’ इस प्रकार प्रजापति दक्ष ने अपने दामाद चन्द्रमा को प्रेमपूर्वक समझाया और ऐसा सोच लिया कि चन्द्रमा में सुधार हो जाएगा। उसके बाद प्रजापति दक्ष वापस चले गये।

इतना समझाने पर भी चन्द्रमा ने अपने ससुर प्रजापति दक्ष की बात नहीं मानी। रोहिणी के प्रति अतिशय आसक्ति के कारण उन्होंने अपने कर्त्तव्य की अवहेलना की तथा अपनी अन्य पत्नियों का कुछ भी ख्याल नहीं रखा और उन सभी से उदासीन रहे। दुबारा समाचार प्राप्त कर प्रजापति दक्ष बड़े दुःखी हुए। वे पुनः चन्द्रमा के पास आकर उन्हें उत्तम नीति के द्वारा समझने लगे। दक्ष ने चन्द्रमा से न्यायोचित बर्ताव करने की प्रार्थना की। बार-बार आग्रह करने पर भी चन्द्रमा ने अवहेलनापूर्वक जब दक्ष की बात नहीं मानी, तब उन्होंने शाप दे दिया। दक्ष ने कहा कि मेरे आग्रह करने पर भी तुमने मेरी अवज्ञा की है, इसलिए तुम्हें क्षयरोग हो जाय।

दक्ष द्वारा शाप देने के साथ ही क्षण भर में चन्द्रमा क्षय रोग से ग्रसित हो गये। उनके क्षीण होते ही सर्वत्र हाहाकार मच गया। सभी देवगण तथा ऋषिगण भी चिंतित हो गये। परेशान चन्द्रमा ने अपनी अस्वस्थता तथा उसके कारणों की सूचना इन्द्र आदि देवताओं तथा ऋषियों को दी। उसके बाद उनकी सहायता के लिए इन्द्र आदि देवता तथा वसिष्ठ आदि ऋषिगण ब्रह्माजी की शरण में गये। ब्रह्मा जी ने उनसे कहा कि जो घटना हो गई है, उसे तो भुगतना ही है, क्योंकि दक्ष के निश्चय को पलटा नहीं जा सकता। उसके बाद ब्रह्माजी ने उन देवताओं को एक उत्तम उपाय बताया।

ब्रह्माजी ने कहा कि चन्द्रमा देवताओं के साथ कल्याणकारक शुभ प्रभास क्षेत्र में चले जायें। वहाँ पर विधिपूर्वक शुभ मृत्युंजय-मंत्र का अनुष्ठान करते हुए श्रद्धापूर्वक भगवान शिव की आराधना करें। अपने सामने शिवलिंग की स्थापना करके प्रतिदिन कठिन तपस्या करें। इनकी आराधना और तपस्या से जब भगवान भोलेनाथ प्रसन्न हो जाएँगे, तो वे इन्हें क्षय रोग से मुक्त कर देगें। पितामह ब्रह्माजी की आज्ञा को स्वीकार कर देवताओं और ऋषियों के संरक्षण में चन्द्रमा देवमण्डल सहित प्रभास क्षेत्र में पहुँच गये।

वहाँ चन्द्रदेव ने मृत्युंजय भगवान की अर्चना-वन्दना और अनुष्ठान प्रारम्भ किया। वे मृत्युंजय-मंत्र का जप तथा भगवान शिव की उपासना में तल्लीन हो गये। ब्रह्मा की ही आज्ञा के अनुसार चन्द्रमा ने छः महीने तक निरन्तर तपस्या की और वृषभ ध्वज का पूजन किया। दस करोड़ मृत्यंजय-मंत्र का जप तथा ध्यान करते हुए चन्द्रमा स्थिरचित्त से वहाँ निरन्तर खड़े रहे। उनकी उत्कट तपस्या से भक्तवत्सल भगवान शंकर प्रसन्न हो गये। उन्होंने चन्द्रमा से कहा- ‘चन्द्रदेव! तुम्हारा कल्याण हो। तुम जिसके लिए यह कठोर तप कर रहे हो, उस अपनी अभिलाषा को बताओ। मै तुम्हारी इच्छा के अनुसार तुम्हें उत्तम वर प्रदान करूँगा।’ चन्द्रमा ने प्रार्थना करते हुए विनयपूर्वक कहा- ‘देवेश्वर! आप मेरे सब अपराधों को क्षमा करें और मेरे शरीर के इस क्षयरोग को दूर कर दें।’

भगवान शिव ने कहा– ‘चन्द्रदेव! तुम्हारी कला प्रतिदिन एक पक्ष में क्षीण हुआ करेगी, जबकि दूसरे पक्ष में प्रतिदिन वह निरन्तर बढ़ती रहेगी। इस प्रकार तुम स्वस्थ और लोक-सम्मान के योग्य हो जाओगे। भगवान शिव का कृपा-प्रसाद प्राप्त कर चन्द्रदेव बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने भक्तिभावपूर्वक शंकर की स्तुति की। ऐसी स्थिति में निराकार शिव उनकी दृढ़ भक्ति को देखकर साकार लिंग रूप में प्रकट हुए और संसार में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध हुए।

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                    पौराणिक कथाएँ

                 मल्लिकार्जुन की कथा

एक बार शिव-पार्वती के दोनों पुत्र कार्तिकेय और गणेश विवाह के लिए आपस में कलह करने लगे। कार्तिकेय का कहना था कि वे बड़े हैं, इसलिए उनका विवाह पहले होना चाहिए, किन्तु श्री गणेश अपना विवाह पहले करना चाहते थे। इस झगड़े का फैसला कराने के लिए दोनों अपने माता-पिता के पास पहुँचे। उनके माता-पिता ने कहा कि तुम दोनों में जो कोई इस पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले यहाँ आ जाएगा, उसी का विवाह पहले होगा।

शर्त सुनते ही कार्तिकेय जी पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए दौड़ पड़े। इधर स्थूलकाय श्री गणेश जी और उनका वाहन भी चूहा, भला इतनी शीघ्रता से वे परिक्रमा कैसे कर सकते थे। गणेश जी के सामने भारी समस्या उपस्थित थी। श्रीगणेश जी शरीर से ज़रूर स्थूल हैं, किन्तु वे बुद्धि के सागर हैं। उन्होंने कुछ सोच-विचार किया और अपनी माता पार्वती तथा पिता देवाधिदेव महेश्वर से एक आसन पर बैठने का आग्रह किया। उन दोनों के आसन पर बैठ जाने के बाद श्रीगणेश ने उनकी सात परिक्रमा की, फिर विधिवत् पूजन किया।

इस प्रकार श्रीगणेश माता-पिता की परिक्रमा करके पृथ्वी की परिक्रमा से प्राप्त होने वाले फल की प्राप्ति के अधिकारी बन गये। उनकी चतुर बुद्धि को देख कर शिव और पार्वती दोनों बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने श्रीगणेश का विवाह भी करा दिया। जिस समय स्वामी कार्तिकेय सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके वापस आये, उस समय श्रीगणेश जी का विवाह विश्वरूप प्रजापति की पुत्रियों सिद्धि और रिद्धि के साथ हो चुका था। इतना ही नहीं श्री गणेशजी को उनकी ‘सिद्धि’ नामक पत्नी से ‘शुभ’ तथा रिद्धि नामक पत्नी से ‘लाभ’, ये दो पुत्ररत्न भी मिल गये थे। भ्रमणशील और जगत का कल्याण करने वाले देवर्षि नारद ने स्वामी कार्तिकेय से यह सारा वृतान्त कह सुनाया। श्रीगणेश का विवाह और उन्हें पुत्र लाभ का समाचार सुनकर स्वामी कार्तिकेय जल उठे। इस प्रकरण से नाराज़ कार्तिक ने शिष्टाचार का पालन करते हुए अपने माता-पिता के चरण छुए और वहाँ से चल दिये।

माता-पिता से अलग होकर कार्तिक क्रौंच पर्वत पर रहने लगे। शिव और पार्वती ने अपने पुत्र कार्तिकेय को समझा-बुझाकर बुलाने हेतु देवर्षि नारद को क्रौंचपर्वत पर भेजा। देवर्षि नारद ने बहुत प्रकार से स्वामी को मनाने का प्रयास किया, किन्तु वे वापस नहीं आये। उसके बाद कोमल हृदय माता पार्वती पुत्र स्नेह में व्याकुल हो उठीं। वे भगवान शिव जी को लेकर क्रौंच पर्वत पर पहुँच गईं। इधर स्वामी कार्तिकेय को क्रौंच पर्वत अपने माता-पिता के आगमन की सूचना मिल गई और वे वहाँ से तीन योजन अर्थात छत्तीस किलोमीटर दूर चले गये। कार्तिकेय के चले जाने पर भगवान शिव उस क्रौंच पर्वत पर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हो गये तभी से वे ‘मल्लिकार्जुन’ ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध हुए। ‘मल्लिका’ माता पार्वती का नाम है, जबकि ‘अर्जुन’ भगवान शंकर को कहा जाता है। इस प्रकार सम्मिलित रूप से ‘मल्लिकार्जुन’ नाम उक्त ज्योतिर्लिंग का जगत में प्रसिद्ध हुआ।

एक अन्य कथा के अनुसार कौंच पर्वत के समीप में ही चन्द्रगुप्त नामक किसी राजा की राजधानी थी। उनकी राजकन्या किसी संकट में उलझ गई थी। उस विपत्ति से बचने के लिए वह अपने पिता के राजमहल से भागकर पर्वतराज की शरण में पहुँच गई। वह कन्या ग्वालों के साथ कन्दमूल खाती और दूध पीती थी। इस प्रकार उसका जीवन-निर्वाह उस पर्वत पर होने लगा। उस कन्या के पास एक श्यामा (काली) गौ थी, जिसकी सेवा वह स्वयं करती थी। उस गौ के साथ विचित्र घटना घटित होने लगी। कोई व्यक्ति छिपकर प्रतिदिन उस श्यामा का दूध निकाल लेता था। एक दिन उस कन्या ने किसी चोर को श्यामा का दूध दुहते हुए देख लिया, तब वह क्रोध में आगबबूला हो उसको मारने के लिए दौड़ पड़ी। जब वह गौ के समीप पहुँची, तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, क्योंकि वहाँ उसे एक शिवलिंग के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं दिया। आगे चलकर उस राजकुमारी ने उस शिवलिंग के ऊपर एक सुन्दर सा मन्दिर बनवा दिया। वही प्राचीन शिवलिंग आज ‘मल्लिकार्जुन’ ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध है। पुरातत्त्ववेत्ताओं के अनुसार इस मंदिर निर्माणकार्य लगभग दो हज़ार वर्ष प्राचीन है।

Monday, 7 August 2017

เค•เคฅा เคธाเค—เคฐ : เคฐाเค–ी เค•ी เค•เคฅाเคँ

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                       เคฐाเค–ी เค•ी เค•เคฅाเคँ

                          เค•เคฅा เคธाเค—เคฐ

                         

                         เคชเคนเคฒी  เค•เคฅा
   
      เคฒเค•्เคท्เคฎी เคจे เคฌांเคงी เคฆाเคจเคต เคฐाเคœ เคฌเคฒि เค•ो เคฐाเค–ी

เคชुเคฐाเคฃों เค•े เค…เคจुเคธाเคฐ เคฐเค•्เคทा เคฌंเคงเคจ เคชเคฐ्เคต เคฒเค•्เคท्เคฎी เคœी เค•ा เคฌเคฒी เค•ो เคฐाเค–ी เคฌांเคงเคจे เคธे เคœुเคกा เคนुเค† เคนै। เค‡เคธเค•े เคฒिเค เคชुเคฐाเคฃों เคฎें เคเค• เค•เคฅा เคนै เคœो เค‡เคธ เคช्เคฐเค•ाเคฐ เคนै – เคœเคฌ เคฆाเคจเคตो เค•े เคฐाเคœा เคฌเคฒि เคจे เค…เคชเคจे เคธौ เคฏเคœ्เคž เคชुเคฐे เค•เคฐ เคฒिเค เคคो เค‰เคจ्เคนोंเคจे เคšाเคนा เค•ि เค‰เคธे เคธ्เคตเคฐ्เค— เค•ी เคช्เคฐाเคช्เคคि เคนो, เคฐाเคœा เคฌเคฒि เค•ि เค‡เคธ เคฎเคจोเค‡เคš्เค›ा เค•ा เคญाเคจ เคฆेเคต เค‡เคจ्เคฆ्เคฐ เค•ो เคนोเคจे เคชเคฐ, เคฆेเคต เคฐाเคœ เค‡เคจ्เคฆ्เคฐ เค•ा เคธिเคนांเคธเคจ เคกोเคฒเคจे เคฒเค—ा।

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                              เคคीเคธเคฐी เค•เคฅा

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เคฐเค•्เคทाเคฌंเคงเคจ เคธे เคœुเฅœा เคเค• เคช्เคฐเคธंเค— เคฎเคนाเคญाเคฐเคค เคฎें เคญी เค†เคคा เคนै। เคฎเคนाเคญाเคฐเคค เคฎें เค•ृเคท्เคฃ เคจे เคถिเคถुเคชाเคฒ เค•ा เคตเคง เค…เคชเคจे เคšเค•्เคฐ เคธे เค•िเคฏा เคฅा। เคถिเคถुเคชाเคฒ เค•ा เคธिเคฐ เค•ाเคŸเคจे เค•े เคฌाเคฆ เคœเคฌ เคšเค•्เคฐ เคตाเคชเคธ เค•ृเคท्เคฃ เค•े เคชाเคธ เค†เคฏा เคคो เค‰เคธ เคธเคฎเคฏ เค•ृเคท्เคฃ เค•ी เค‰ंเค—เคฒी เค•เคŸ เค—เคˆ เคญเค—เคตाเคจ เค•ृเคท्เคฃ เค•ी เค‰ंเค—เคฒी เคธे เคฐเค•्เคค เคฌเคนเคจे เคฒเค—ा। เคฏเคน เคฆेเค–เค•เคฐ เคฆ्เคฐौเคชเคฆी เคจे เค…เคชเคจी เคธाเคกी़ เค•ा เค•िเคจाเคฐा เคซाเคก़ เค•เคฐ เค•ृเคท्เคฃ เค•ी เค‰ंเค—เคฒी เคฎें เคฌांเคงा เคฅा, เคœिเคธเค•ो เคฒेเค•เคฐ เค•ृเคท्เคฃ เคจे เค‰เคธเค•ी เคฐเค•्เคทा เค•เคฐเคจे เค•ा เคตเคšเคจ เคฆिเคฏा เคฅा। เค‡เคธी เค‹เคฃ เค•ो เคšुเค•ाเคจे เค•े เคฒिเค เคฆु:เคถाเคธเคจ เคฆ्เคตाเคฐा เคšीเคฐเคนเคฐเคฃ เค•เคฐเคคे เคธเคฎเคฏ เค•ृเคท्เคฃ เคจे เคฆ्เคฐौเคชเคฆी เค•ी เคฒाเคœ เคฐเค–ी। เคคเคฌ เคธे ‘เคฐเค•्เคทाเคฌंเคงเคจ’ เค•ा เคชเคฐ्เคต เคฎเคจाเคจे เค•ा เคšเคฒเคจ เคšเคฒा เค† เคฐเคนा เคนै।

                              เคšौเคฅी เค•เคฅा

             เคฎเคนाเคฐाเคจी เค•เคฐ्เคฃाเคตเคคी เค•ी เค•เคนाเคจी

เคฎเคง्เคฏเค•ाเคฒीเคจ เคฏुเค— เคฎें เคฐाเคœเคชूเคค เคต เคฎुเคธ्เคฒिเคฎों เค•े เคฌीเคš เคธंเค˜เคฐ्เคท เคšเคฒ เคฐเคนा เคฅा। เคฐाเคจी เค•เคฐ्เคฃाเคตเคคी เคšिเคคौเคก़ เค•े เคฐाเคœा เค•ी เคตिเคงเคตा เคฅीं। เคฐाเคจी เค•เคฐ्เคฃाเคตเคคी เค•ो เคœเคฌ เคฌเคนाเคฆुเคฐเคถाเคน เคฆ्เคตाเคฐा เคฎेเคตाเคก़ เคชเคฐ เคนเคฎเคฒा เค•เคฐเคจे เค•ी เคชूเคฐ्เคตเคธूเคšเคจा เคฎिเคฒी เคคो เคตเคน เค˜เคฌเคฐा เค—เคˆ। เคฐाเคจी เค•เคฐ्เคฃाเคตเคคी, เคฌเคนाเคฆुเคฐเคถाเคน เคธे เคฏुเคฆ्เคง เค•เคฐ เคชाเคจे เคฎें เค…เคธเคฎเคฐ्เคฅ เคฅी। เค…เคชเคจी เคช्เคฐเคœा เค•ी เคธुเคฐเค•्เคทा เค•ा เค•ोเคˆ เคฐाเคธ्เคคा เคจ เคจिเค•เคฒเคคा เคฆेเค– เคฐाเคจी เคจे เคนुเคฎाเคฏूं เค•ो เคฐाเค–ी เคญेเคœी เคฅी। เคนुเคฎाเคฏूं เคจे เคฐाเค–ी เค•ी เคฒाเคœ เคฐเค–ी เค”เคฐ เคฎेเคตाเคก़ เคชเคนुंเคš เค•เคฐ เคฌเคนाเคฆुเคฐเคถाเคน เค•े เคตिเคฐुเคฆ्เค˜ เคฎेเคตाเคก़ เค•ी เค“เคฐ เคธे เคฒเคก़เคคे เคนुเค เค•เคฐ्เคฃाเคตเคคी เค”เคฐ เค‰เคธเค•े เคฐाเคœ्เคฏ เค•ी เคฐเค•्เคทा เค•ी। เคฆเคฐเค…เคธเคฒ, เคนुเคฎाเคฏूं เค‰เคธ เคธเคฎเคฏ เคฌंเค—ाเคฒ เคชเคฐ เคšเคข़ाเคˆ เค•เคฐเคจे เคœा เคฐเคนा เคฅा เคฒेเค•िเคจ เคฐाเคจी เค•े เค”เคฐ เคฎेเคตाเคฐ เค•ी เคฐเค•्เคทा เค•े เคฒिเค เค…เคชเคจे เค…เคญिเคฏाเคจ เค•ो เคฌीเคš เคฎें เคนी เค›ोเคก़ เคฆिเคฏा।

Saturday, 5 August 2017

เคชौเคฐाเคฃिเค• เค•เคฅाเคँ : เคฎเคนाเคฆुเคฐ्เค—ा เค•ा เค…เคตเคคाเคฐ

                     पौराणिक कथाएँ

                   महादुर्गा का अवतार

एक बार महिषासुर नामक असुरों के राजा ने अपने बल और पराक्रम से देवताओं से स्वर्ग छिन लिया। जब सारे देवता भगवान शंकर व विष्णु के पास सहायता के लिए गए। पूरी बात जानकर शंकर व विष्णु को क्रोध आया तब उनके तथा अन्य देवताओं से मुख से तेज प्रकट हुआ, जो नारी स्वरूप में परिवर्तित हो गया।

शिव के तेज से देवी का मुख, यमराज के तेज से केश, विष्णु के तेज से भुजाएं, चंद्रमा के तेज से वक्षस्थल, सूर्य के तेज से पैरों की अंगुलियां, कुबेर के तेज से नाक, प्रजापति के तेज से दांत, अग्नि के तेज से तीनों नेत्र, संध्या के तेज से भृकुटि और वायु के तेज से कानों की उत्पत्ति हुई।

इसके बाद देवी को शस्त्रों से सुशोभित भी देवों ने किया।

1. भगवान शंकर ने मां शक्ति को  
    त्रिशूल भेंट किया।

2. भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र
    प्रदान दिया।

3. वरुण देव ने शंख भेंट किया।

4. अग्निदेव ने अपनी शक्ति
    प्रदान की।

5. पवनदेव ने धनुष और बाण
    भेंट किए।

6. इंद्रदेव ने वज्र और घंटा अर्पित
    किया।

7. यमराज ने कालदंड भेंट
    किया।

8. प्रजापति दक्ष ने स्फटिक माला
    दी।

9. भगवान ब्रह्मा ने कमंडल भेंट
    दिया।

10. सूर्य देव ने माता को तेज       
       प्रदान किया।

11. समुद्र ने मां को उज्जवल
       हार, दो दिव्य वस्त्र, दिव्य
       चूड़ामणि, दो कुंडल, कड़े,
       अर्धचंद्र, सुंदर हंसली और
       अंगुलियों में पहनने के लिए
        रत्नों की अंगूठियां भेंट कीं।

12. सरोवरों ने उन्हें कभी न
       मुरझाने वाली कमल की
       माला अर्पित की।

13. पर्वतराज हिमालय ने मां दुर्गा
       को सवारी करने के लिए
       शक्तिशाली सिंह भेंट किया।

14. कुबेर देव ने मधु (शहद) से
       भरा पात्र मां को दिया।

देवताओं से शक्तियां प्राप्त कर महादुर्गा ने युद्ध में महिषासुर का वध कर देवताओं को पुन: स्वर्ग सौंप दिया। महिषासुर का वध करने के कारण उन्हें ही महादुर्गा को महिषासुरमर्दिनी भी कहा जाता है।

Friday, 4 August 2017

เคชौเคฐाเคฃिเค• เค•เคฅाเคँ : เคชंเคšเค•ेเคฆाเคฐ เค•ी เค•เคฅा

                  पौराणिक कथाएँ

                पंचकेदार की कथा

समुद्रतल से १३,०७२ फीट की ऊंचाई पर बसा तुंगनाथ धाम पर्वतीय क्षेत्र का सबसे ऊंचा शिव मंदिर है। पचास फीट ऊंचे इस इंदिर की बनावट और कला देखते ही बनती है। देखनेवाली बात यह है कि यह धाम जितनी अधिक ऊंचाई पर बसा है यहां पहुंचना उतना ही आसान और कम समय लगता है। चमोली के ठीक बद्रीनाथ और केदारनाथ के बीच गोपेश्वर-ऊखीमठ मोटर मार्ग पर चोपता नामक चट्टी से पैदल तीन किलोमीटर चढ़ाई के बाद तुंगनाथ धाम पहुंच जाते हैं। 

यह मंदिर किस काल का है और किसने बनाया इसकी प्रामाणिक जानकारी अभी तक नहीं मिल पाई है। क्षेत्रीय लोग पाण्डवॊं द्वारा निर्मित बताते हैं। ऐसी भी मान्यता है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने उत्तराखंड यात्रा के दौरान इस मंदिर को बनाया था। मंदिर के गर्भगृह में शंकराचार्य की भव्य मूर्ति है, तो पाण्डवॊं की भी प्रतिमायें हैं। वेदव्यास और काल भैरॊ की दो अष्टधातु की मूर्तियों सहित गर्भगृह में दुर्लभ मूर्तियों की भरमार है। लगभग सभी प्रमुख देवी-देवता यहां आसीन हैं। एक फुट ऊंचा उत्तर की ओर झुका श्यामवर्णी शिवलिंग विशेष दर्शनीय है। स्थानीय लोग इसे शिवजी की बांह कहते हैं। इसकी भी दिलचस्प लोककथा है।

एक बार पाण्डव श्राप मुक्ति के लिए बाबा भोलेनाथ को खुश करने के लिए घूमते-घूमते केदारनाथ पहुंचे। शिवजी कुपित थे और पांडवॊं को दर्शन देना नहीं चाहते थे। केदारनाथ में जहां स्थानीय लोगों की भैंसें चर रही थी, वहीं शिवाजी ने एक भैंसे का रूप धारण कर लिया और भैसों के झुण्ड में शामिल हो गये। अचानक ही एक असाधारण और नये भैंस को टपका देखकर भीम को बेहद आश्चर्य हुआ। उन्हें शक हुआ कि कहीं शिवजी की करामात तो नहीं है। 

भीम ने सोचा एक संकरी घाटी से सभी भैंसे गुजरेंगी, वहीं भीम पांव जमाकर खड़े हो गए। कुछ देर में सभी भैंसें गुजर गईं लेकिन भैंस बने शिव ही पीछे रह गये और धर्मसंकट में पड़ गये। वे कैसे भीम की टांगों के नीचे से गुजरें? भीम माजरा समझ गये। उन्होंने उस असाधारण भैंस को पकड़ना चाहा तो भैंस जमीन के अन्दर धंसने लगी भीम केवल पृष्ठभाग ही पकड़ पाये। कहा जाता है कि शिवजी के ये अंग विग्रह के रूप में पांच जगहों पर निकले। पृष्ठभाग केदारनाथ में निकला। जहां आज भी मुख्यत: इसकी पूजा होती है। मध्य भाग मदमहेश्वर में निकला, बाहें तुंगनाथ, मुंह रुद्रनाथ और जटायें कल्पनाथ में प्रकट हुईं। ये पांचों पांच धाम पंचकेदार के नाम से जाने जाते हैं।

เคชौเคฐाเคฃिเค• เค•เคฅाเคँ : เคฌเคฆ्เคฐीเคจाเคฅเคงाเคฎ เค”เคฐ เค•ेเคฆाเคฐเคจाเคฅเคงाเคฎ เค•ी เค•เคฅा

                    पौराणिक कथाएँ

  बद्रीनाथधाम और केदारनाथधाम की कथा

माना जाता है कि बद्रीनाथ धाम कभी भगवान शिव और पार्वती का विश्राम स्थान हुआ करता था। यहां भगवान शिव अपने परिवार के साथ रहते थे लेकिन श्रीहरि विष्णु को यह स्थान इतना अच्छा लगा कि उन्होंने इसे प्राप्त करने के लिए योजना बनाई।

पुराण कथा के अनुसार सतयुग में जब भगवान नारायण बद्रीनाथ आए तब यहां बदरीयों यानी बेर का वन था और यहां भगवान शंकर अपनी अर्द्धांगिनी पार्वतीजी के साथ मजे से रहते थे। एक दिन श्रीहरि विष्णु बालक का रूप धारण कर जोर-जोर से रोने लगे।

उनके रुदन को सुनकर माता पार्वती को बड़ी पीड़ा हुई। वे सोचने लगीं कि इस बीहड़ वन में यह कौन बालक रो रहा है? यह आया कहां से? और इसकी माता कहां है? यही सब सोचकर माता को बालक पर दया आ गई। तब वे उस बालक को लेकर अपने घर पहुंचीं।

शिवजी तुरंत ही ‍समझ गए कि यह कोई विष्णु की लीला है। उन्होंने पार्वती से इस बालक को घर के बाहर छोड़ देने का आग्रह किया और कहा कि वह अपने आप ही कुछ देर रोकर चला जाएगा। लेकिन पार्वती मां ने उनकी बात नहीं मानी और बालक को घर में ले जाकर चुप कराकर सुलाने लगी।

कुछ ही देर में बालक सो गया तब माता पार्वती बाहर आ गईं और शिवजी के साथ कुछ दूर भ्रमण पर चली गईं। भगवान विष्णु को इसी पल का इंतजार था। इन्होंने उठकर घर का दरवाजा बंद कर दिया।

भगवान शिव और पार्वती जब घर लौटे तो द्वार अंदर से बंद था। इन्होंने जब बालक से द्वार खोलने के लिए कहा तब अंदर से बालक रूपी भगवान विष्णु ने कहा कि  यह स्थान मुझे बहुत पसंद आ गया है। मुझे यहीं विश्राम करने दी‍जिए। मै दरवाजे नहीं खोलूँगा। भगवान शिव को आख़िरकार वह स्थान छोड़ना पड़ा ।

तब से लेकर आज तक बद्रीनाथ यहां पर अपने भक्तों को दर्शन दे रहे हैं और भगवान शिव केदानाथ में।

เคชौเคฐाเคฃिเค• เค•เคฅाเคँ : เคฎเค•เคฐเคง्เคตเคœ เค•े เคœเคจ्เคฎ เค•ी เค•เคนाเคจी

                   पौराणिक कथाएँ

         मकरध्वज के जन्म की कहानी

ऐसे कहा जाता है जिस समय हनुमानजी सीता की खोज में लंका पहुंचे। उस समय मेघनाद ने उन्हें पकड़ा और रावण के दरबार में प्रस्तुत किया। तब रावण ने उनकी पूंछ में आग लगवा दी और हनुमान ने जलती हुई पूंछ से पूरी लंका जला दी। जलती हुई पूंछ की वजह से हनुमानजी को तीव्र वेदना हो रही थी। इसे शांत करने के लिए वे समुद्र के जल से अपनी पूंछ की अग्नि को शांत करने पहुंचे।

उस समय उनके पसीने की एक बूंद पानी में टपकी, जिसे एक मछली ने पी लिया था। उसी पसीने की बूंद से वह मछली गर्भवती हो गई और उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसका नाम पड़ा मकरध्वज। मकरध्वज भी हनुमानजी के समान ही महान पराक्रमी और तेजस्वी था। उसे अहिरावण द्वारा पाताल लोक का द्वारपाल नियुक्त किया गया था।

जब अहिरावण श्रीराम और लक्ष्मण को देवी के समक्ष बलि चढ़ाने के लिए अपनी माया के बल पर पाताल ले आया था। तब श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराने के लिए हनुमान पाताल लोक पहुंचे और वहां उनकी भेंट मकरध्वज से हुई। उसके बाद मकरध्वज ने अपनी उत्पत्ति की कथा हनुमान को सुनाई। हनुमानजी ने अहिरावण का वध कर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराया और श्रीराम ने मकरध्वज को पाताल लोक का अधिपति नियुक्त करते हुए उसे धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।

Wednesday, 2 August 2017

เคชौเคฐाเคฃिเค• เค•เคฅाเคँ : เคถिเคต-เคชाเคฐ्เคตเคคी เคฆ्เคฏुเคค เค•्เคฐीเฅœा

Story Time ๐Ÿ˜Š

                             เคชौเคฐाเคฃिเค• เค•เคฅाเคँ

                    เคถिเคต-เคชाเคฐ्เคตเคคी เคฆ्เคฏुเคค เค•्เคฐीเฅœा (เคœुเค†)


เคเค• เคฌाเคฐ เคญเค—เคตाเคจ เคถंเค•เคฐ เคจे เคฎाเคคा เคชाเคฐ्เคตเคคी เค•े เคธाเคฅ เคฆ्เคฏुเคค (เคœुเค†) เค–ेเคฒเคจे เค•ी เค…เคญिเคฒाเคทा เคช्เคฐเค•เคŸ เค•ी। เค–ेเคฒ เคฎें เคญเค—เคตाเคจ เคถंเค•เคฐ เค…เคชเคจा เคธเคฌ เค•ुเค› เคนाเคฐ เค—เค। เคนाเคฐเคจे เค•े เคฌाเคฆ เคญोเคฒेเคจाเคฅ เค…เคชเคจी เคฒीเคฒा เค•ो เคฐเคšเคคे เคนुเค เคชเคค्เคคो เค•े เคตเคธ्เคค्เคฐ เคชเคนเคจเค•เคฐ เค—ँเค—ा เค•े เคคเคŸ เคชเคฐ เคšเคฒे เค—เค। เค•ाเคฐ्เคคिเค•ेเคฏ เคœी เค•ो เคœเคฌ เคธाเคฐी เคฌाเคค เคชเคคा เคšเคฒी, เคคो เคตเคน เคฎाเคคा เคชाเคฐ्เคตเคคी เคธे เคธเคฎเคธ्เคค เคตเคธ्เคคुเคँ เคตाเคชเคธ เคฒेเคจे เค†เค। 

เค‡เคธ เคฌाเคฐ เค–ेเคฒ เคฎें เคชाเคฐ्เคตเคคी เคœी เคนाเคฐ เค—เคˆं เคคเคฅा เค•ाเคฐ्เคคिเค•ेเคฏ เคถंเค•เคฐ เคœी เค•ा เคธाเคฐा เคธाเคฎाเคจ เคฒेเค•เคฐ เคตाเคชเคธ เคšเคฒे เค—เค। เค…เคฌ เค‡เคงเคฐ เคชाเคฐ्เคตเคคी เคญी เคšिंเคคिเคค เคนो เค—เคˆं เค•ि เคธाเคฐा เคธाเคฎाเคจ เคญी เค—เคฏा เคคเคฅा เคชเคคि เคญी เคฆूเคฐ เคนो เค—เค। เคชाเคฐ्เคตเคคी เคœी เคจे เค…เคชเคจी เคต्เคฏเคฅा เค…เคชเคจे เคช्เคฐिเคฏ เคชुเคค्เคฐ เค—เคฃेเคถ เค•ो เคฌเคคाเคˆ เคคो เคฎाเคคृ เคญเค•्เคค เค—เคฃोเคถ เคœी เคธ्เคตเคฏं เค–ेเคฒ เค–ेเคฒเคจे เคถंเค•เคฐ เคญเค—เคตाเคจ เค•े เคชाเคธ เคชเคนुँเคšे। 

เค—เคฃेเคถ เคœी เคœीเคค เค—เค เคคเคฅा เคฒौเคŸเค•เคฐ เค…เคชเคจी เคœीเคค เค•ा เคธเคฎाเคšाเคฐ เคฎाเคคा เค•ो เคธुเคจाเคฏा। เค‡เคธ เคชเคฐ เคชाเคฐ्เคตเคคी เคฌोเคฒीं เค•ि เค‰เคจ्เคนें เค…เคชเคจे เคชिเคคा เค•ो เคธाเคฅ เคฒेเค•เคฐ เค†เคจा เคšाเคนिเค เคฅा। เค—เคฃेเคถ เคœी เคซिเคฐ เคญोเคฒेเคจाเคฅ เค•ी เค–ोเคœ เค•เคฐเคจे เคจिเค•เคฒ เคชเฅœे। เคญोเคฒेเคจाเคฅ เคธे เค‰เคจเค•ी เคญेंเคŸ เคนเคฐिเคฆ्เคตाเคฐ เคฎें เคนुเคˆ। เค‰เคธ เคธเคฎเคฏ เคญोเคฒे เคจाเคฅ เคญเค—เคตाเคจ เคตिเคท्เคฃु เคต เค•ाเคฐ्เคคिเค•ेเคฏ เค•े เคธाเคฅ เคญ्เคฐเคฎเคฃ เค•เคฐ เคฐเคนे เคฅे।

เคชाเคฐ्เคตเคคी เคธे เคจाเคฐाเคœ เคญोเคฒेเคจाเคฅ เคจे เคฒौเคŸเคจे เคธे เคฎเคจा เค•เคฐ เคฆिเคฏा। เคญोเคฒेเคจाเคฅ เค•े เคญเค•्เคค เคฐाเคตเคฃ เคจे เค—เคฃेเคถ เคœी เค•े เคตाเคนเคจ เคฎूเคทเค• เค•ो เคฌिเคฒ्เคฒी เค•ा เคฐूเคช เคงाเคฐเคฃ เค•เคฐเค•े เคกเคฐा เคฆिเคฏा। เคฎूเคทเค• เค—เคฃेเคถ เคœी เค•ो เค›ोเฅœเค•เคฐ เคญाเค— เค—เค। เค‡เคงเคฐ เคญเค—เคตाเคจ เคตिเคท्เคฃु เคจे เคญोเคฒेเคจाเคฅ เค•ी เค‡เคš्เค›ा เคธे เคชाเคธा เค•ा เคฐूเคช เคงाเคฐเคฃ เค•เคฐ เคฒिเคฏा เคฅा। เค—เคฃेเคถ เคœी เคจे เคฎाเคคा เค•े เค‰เคฆाเคธ เคนोเคจे เค•ी เคฌाเคค เคญोเคฒेเคจाเคฅ เค•ो เค•เคน เคธुเคจाเคˆ।

เค‡เคธ เคชเคฐ เคญोเคฒेเคจाเคฅ เคฌोเคฒे เค•ि, เคนเคฎเคจे เคจเคฏा เคชाเคธा เคฌเคจเคตाเคฏा เคนै, เค…เค—เคฐ เคคुเคฎ्เคนाเคฐी เคฎाเคคा เคชुเคจ: เค–ेเคฒ เค–ेเคฒเคจे เค•ो เคธเคนเคฎเคค เคนों, เคคो เคฎैं เคตाเคชเคธ เคšเคฒ เคธเค•เคคा เคนूँ। 

เค—เคฃेเคถ เคœी เค•े เค†เคถ्เคตाเคธเคจ เคชเคฐ เคญोเคฒेเคจाเคฅ เคตाเคชเคธ เคชाเคฐ्เคตเคคी เค•े เคชाเคธ เคชเคนुँเคšे เคคเคฅा เค–ेเคฒ เค–ेเคฒเคจे เค•ो เค•เคนा। เค‡เคธ เคชเคฐ เคชाเคฐ्เคตเคคी เคนँเคธ เคชเฅœी เคต เคฌोเคฒीं, เค…เคญी เค†เคช เค•े เคชाเคธ เค•्เคฏा เคšीเคœ เคนै, เคœिเคธเคธे เค–ेเคฒ เค–ेเคฒा เคœाเค। 

เคฏเคน เคธुเคจเค•เคฐ เคญोเคฒेเคจाเคฅ เคšुเคช เคนो เค—เค। เค‡เคธ เคชเคฐ เคจाเคฐเคฆ เคœी เคจे เค…เคชเคจी เคตीเคฃा เค†เคฆि เคธाเคฎเค—्เคฐी เค‰เคจ्เคนें เคฆी। เค‡เคธ เค–ेเคฒ เคฎें เคญोเคฒेเคจाเคฅ เคนเคฐ เคฌाเคฐ เคœीเคคเคจे เคฒเค—े। เคเค• เคฆो เคชाเคธे เคซैंเค•เคจे เค•े เคฌाเคฆ เค—เคฃेเคถ เคœी เคธเคฎเค เค—เค เคคเคฅा เค‰เคจ्เคนोंเคจे เคญเค—เคตाเคจ เคตिเคท्เคฃु เค•े เคชाเคธा เคฐूเคช เคงाเคฐเคฃ เค•เคฐเคจे เค•ा เคฐเคนเคธ्เคฏ เคฎाเคคा เคชाเคฐ्เคตเคคी เค•ो เคฌเคคा เคฆिเคฏा। เคธाเคฐी เคฌाเคค เคธुเคจเค•เคฐ เคชाเคฐ्เคตเคคी เคœी เค•ो เค•्เคฐोเคง เค† เค—เคฏा।

เคฐाเคตเคฃ เคจे เคฎाเคคा เค•ो เคธเคฎเคाเคจे เค•ा เคช्เคฐเคฏाเคธ เค•िเคฏा, เคชเคฐ เค‰เคจเค•ा เค•्เคฐोเคง เคถांเคค เคจเคนीं เคนुเค† เคคเคฅा เค•्เคฐोเคงเคตเคถ เค‰เคจ्เคนोंเคจे เคญोเคฒेเคจाเคฅ เค•ो เคถ्เคฐाเคช เคฆे เคฆिเคฏा เค•ि เค—ंเค—ा เค•ी เคงाเคฐा เค•ा เคฌोเค เค‰เคจเค•े เคธिเคฐ เคชเคฐ เคฐเคนेเค—ा। เคจाเคฐเคฆ เคœी เค•ो เค•เคญी เคเค• เคธ्เคฅाเคจ เคชเคฐ เคจ เคŸिเค•เคจे เค•ा เค…เคญिเคทाเคช เคฎिเคฒा। เคญเค—เคตाเคจ เคตिเคท्เคฃु เค•ो เคถ्เคฐाเคช เคฆिเคฏा เค•ि เคฏเคนी เคฐाเคตเคฃ เคคुเคฎ्เคนाเคฐा เคถเคค्เคฐु เคนोเค—ा เคคเคฅा เคฐाเคตเคฃ เค•ो เคถ्เคฐाเคช เคฆिเคฏा เค•ि เคตिเคท्เคฃु เคนी เคคुเคฎ्เคนाเคฐा เคตिเคจाเคถ เค•เคฐेंเค—े। เค•ाเคฐ्เคคिเค•ेเคฏ เค•ो เคญी เคฎाเคคा เคชाเคฐ्เคตเคคी เคจे เคนเคฎेเคถा เคฌाเคฒ เคฐूเคช เคฎें เคฐเคนเคจे เค•ा เคถ्เคฐाเคช เคฆे เคฆिเคฏा।