Monday, 3 April 2017

เคตिเคฆेเคถी เคฒोเค•เค•เคฅा : เคœैเคธी เค•เคฐเคจी, เคตैเคธी เคญเคฐเคจी


                   मॉरिशस की लोककथा

                   जैसी करनी, वैसी भरनी

एक गांव में रमीना अपने पति व चार बेटों के साथ रहती थी | वह अपने व अपने परिवार के साथ खूब खुशहाल थी | वह मध्यम आय वाला परिवार था | अत: रमीना परिवार की कमाई का अधिकांश भाग बच्चों की शिक्षा पर खर्च करती थी | पिता भी बच्चों को खूब प्यार करता था |

एक दिन अचानक रमीना का पति बीमार हो गया | डॉक्टरों व वैद्य को दिखाया परंतु उन्हें उसकी बीमारी का पता नहीं लग सका | फिर अचानक उसकी मृत्यु हो गई | 

रमीना जैसे-तैसे अपने बेटों को बड़ा करने लगी | परंतु जैसे-जैसे वे बड़े होते गए उन्हें शहर जाने का भूत सवार होने लगा | धीरे-धीरे वे गांव छोड़कर शहर चले गए | शहर में ही विवाह कर वही रहने लगे |

रमीना बूढ़ी हो चुकी थी, परंतु उसने हिम्मत नहीं हारी थी | सिलाई-बुनाई का कार्य करके अकेली ही रहती थी और अपने घर का गुजारा चलाती थी | एक दिन वह रसोई में खीर बना रही थी | खीर कई घंटों से पक रही थी | तभी रमीना को थकान महसूस होने लगी | वह रसोई के पास आंगन में चारपाई डालकर उस पर लेट गई |

रमीना की अचानक आंख लग गई, क्योंकि वह दिन भर की थकी हुई थी | उसके पास घर के नाम पर एक कमरे का किराए का मकान था | उसका अपना मकान कब का बिक चुका था | उसे बेटों से शिकायत थी, परंतु वह कुछ कर नहीं सकती थी |

उसके चारों बेटे गांव छोड़कर जा चुके थे | उन्हें वहां से गए वर्षों बीत गए थे और वे गांव के बारे में सब कुछ भूल चुके थे | परंतु वे वहां जाकर बेईमान बन गए थे |

चारों बेटे मिलकर घरों में चोरी करते थे, फिर माल बांट कर उसी से अपने परिवार का गुजारा करते थे | उन्हें न तो मां की फिक्र थी, न ही कोई सुध | मां का क्या हाल होगा, यह वे नहीं जानना चाहते थे |

चारों बेटे चोरी में इतने माहिर हो चुके थे कि वे कभी पकड़े न जाते थे | एक दिन उन्होंने एक सर्राफ के यहां चोरी की और खूब मालामाल हो गए |

लेकिन चोर को तो चोरी के सिवा कुछ करना आता ही नहीं है अत: वे आलसी बनकर उस माल पर ऐश करने लगे | कुछ ही दिनों में सारा धन और माल समाप्त हो गया | अब उन्हें फिर से धन पाने की चिंता सताने लगी |

एक दिन वे चोरी के इरादे से शाम को घर से निकले | तभी उन्हें एक युवक मिला | वह बोला - "तुम कहां जा रहे हो, मुझे भी साथ ले लो |"

चारों ने उसे इन्कार कर दिया | परंतु वह युवक उनकी खुशामद करने लगा और बोला, "अच्छा भैया, तुम यह बता दो कि तुम कहां जा रहे हो ?"

एक बेटा क्रोधित होकर बोला - "चोरी करने, चलोगे ?"

"हां भैया, सब कुछ करूंगा | मैंने 5 दिन से खाना नहीं खाया है, जैसा कहोगे वैसा ही करूंगा | जो दोगे वही ले लूंगा | अपना हिस्सा भी नहीं मागूंगा |"

चारों भाइयों को बात जंच गई कि मुफ्त में नौकर मिल रहा है जो चोरी में भी साथ देने को तैयार है | फिर वह अपना हिस्सा भी नहीं मांगेगा | उन्होंने युवक को साथ ले लिया, परंतु उसे समझाया - "देखो, तुम पहली बार चोरी करने जा रहे हो, अत: कोई बेवकूफी मत करना |"

युवक तैयार हो गया और उन चारों के साथ चल दिया | चारों भाई चोरी के लिए मकान तलाश करने लगे | उन्होंने कई मकानों में घुसने का प्रयास किया परंतु हर घर में कोई न कोई जाग रहा था | अचानक उन्हें एक घर का दरवाजा खुला दिखाई दिया, वे उसमें घुस गए | वहां उन्होंने खूब जमकर चोरी की | घर का हर सामान एक चादर में बांध लिया, हालांकि घर में कोई भी कीमती सामान न था | परंतु वे चोरी करने निकले थे तो उन्हें कुछ न कुछ तो चुराना ही था |

तभी एक बेटे की रसोई की ओर नजर गई | वहां खीर पक रही थी चारों को लगा कि चलने से पहले गर्मागर्म खीर का मजा ले लेना चाहिए |

पांचों लोग खीर खाने में व्यस्त थे, तभी उनकी निगाह आंगन में सोई बुढ़िया की ओर गई |

चारों बेटे अपनी मां को पहचान न सके, क्योंकि इतने वर्षों में वह बूढ़ी हो चुकी थी | नया चोर युवक बोला - "भैया, यह बुढ़िया कैसे हाथ पसारे सो रही है | लगता है कि यह कह रही है कि सारी खीर अकेले खा जाओगे, मुझे नहीं खिलाओगे |"

दूसरा बोला - "हां, और क्या, यह अपने लिए खीर पका रही है और हमने खत्म कर दी तो यह क्या खाएगी ?"

तभी युवक तेजी से उठा और एक चम्मच खीर बुढ़िया के हाथ पर रख दी | गर्म खीर हाथ पर रखते ही बुढ़िया चिल्लाते हुए उठ बैठी | वह चिल्लाई - "बचाओ, मैं मर गई |"

उसकी आवाज सुनकर पांचों चोर घर के अलग-अलग कोनों में छिप गए | रमीना के चिल्लाने से बहुत सारे पड़ोसी दौड़े आए और पूछने लगे कि क्या हुआ | वह क्यों चिल्ला रही थी |

अचानक हाथ पर गर्म खीर रखने से और भीड़ इकट्ठी होने से रमीना कुछ समझ ही न सकी कि क्या हुआ | वह नींद में थी | तभी एक पड़ोसी ने पूछा - "अम्मां क्या हुआ ?"

रमीना बोली - "पता नहीं क्या हुआ, मैं तो सो रही थी | यह खीर मेरे हाथ पर कहां से आई, यह तो ऊपर वाला ही जाने |"

सभी चोर अलग कोनों में छिपे बुढ़िया की बातें सुन रहे थे और घबरा रहे थे कि वे कहीं पकड़े न जाएं | युवक, जो नया चोर था और पहली बार चोरी करने निकला था, इत्तेफाक से ऊपर छत के किनारे छिपा बैठा था | रमीना की बात सुन कर उसे यूं लगा कि बुढ़िया ने उसे देख लिया है तभी कह रही है कि ऊपर वाला जाने | वह ऊपर छिपे-छिपे ही जोर से बोला - "मैं क्या जानूं, यह तो बाथरूम वाला जाने कि क्या हुआ |"

युवक की बात सुनकर बाथरूम में छिपा चोर घबरा गया कि वह पकड़ा जाएगा तो उसकी पिटाई होगी, वह स्वयं को बचाने के प्रयास में बोला - "मैं क्या जानूं, चारपाई के पीछे वाला जाने |"

तभी चारपाई के पीछे वाला बोल उठा - वाह ! मुझे क्यों फंसा रहे हो, मैं क्या जानूं सीढ़ियों वाला जानता है कि क्या हुआ |"

सीढ़ियों वाले ने भी तुरंत इसी तरह चिल्लाकर कहा - "मुझे क्यों फंसाते हो, मैं क्या जानूं कि क्या हुआ, यह तो बिस्तर के पीछे वाला जानता है |"

सारे अड़ोसी-पड़ोसी व रमीना हैरान थे कि आवाज कहां-कहां से आ रही है | वे सब एक साथ झपट पड़े और पांचों चोरों को पकड़ लिया |

पांचों चोरों को जेल में डाल दिया गया | वहां पुलिस ने उनका अता-पता पूछा तो पता लगा कि उनमें से चार चोर तो रमीना के ही बेटे थे | चारों ने बहुत मिन्नत कि उन्हें बख्श दिया जाए, परंतु रमीना ने कहा - "मैं बचाने वाली कौन होती हूं | जैसी करनी, वैसी भरनी |" 

Sunday, 2 April 2017

เคฒोเค• เค•เคฅा : เคจेเค•ी เค•ा เค‡เคจाเคฎ

              भारतीय लोककथा

                 नेकी का इनाम

बुलबुल बहुत ही भोली-भाली लड़की थी | छल-कपट उसे छू तक नहीं गया था | उसके स्वभाव के विपरीत उसकी एक बहन थी - नाम था रीना | रीना चालाक, मक्कार और आलसी थी |

बुलबुल के साथ प्रकृति ने बहुत बड़ा अन्याय किया था, उसकी मां बचपन में ही परलोक सिधार गई थी | परिवार में बुलबुल की सौतेली मां और सौतेली बहन रीना ही थी | उसके पिता गांव के बाहर काम करते थे | साल में एक बार ही घर आते थे | 

बुलबुल की मां बुलबुल को जरा भी प्यार नहीं करती थी | सारा घर का काम बुलबुल से ही कराती थी | रीना और मां दिन भर पलंग पर बैठकर मस्ती करतीं और खाती-पीती रहतीं | बुलबुल बेचारी सारा दिन काम करती, परंतु मां उसे रूखा-सूखा ही खाने को देती | लेकिन बुलबुल फिर भी अपनी मां से कोई शिकायत नहीं करती थी |

रीना भी अपनी मां की आदत का खूब लाभ उठाती थी | जब-तक मौका पाकर बुलबुल की झूठी शिकायत मां से करती रहती थी | मां इस वजह से बुलबुल की पिटाई करती थी |

एक दिन बुलबुल काम करके थक गई थी | उसे भूख लग रही थी | भूख से उसके पेट में दर्द होने लगा था | उसने मां से कहा - "मां, मेरे पेट में जोर का दर्द है, कुछ खाने को दे दो |"

मां बोली - "पेट में दर्द है और खाने को मांग रही है | खाने से तो पेट दर्द और भी बढ़ जाएगा |"

मां के भोजन न देने से बुलबुल भीतर ही भीतर बहुत दुखी थी, परंतु उसने मां से कुछ नहीं कहा और चुपचाप सारा दिन घर का काम करती रही | उसकी आंखों से आंसू बहने लगे थे | परंतु उन आंसुओं को पोंछने वाला कोई न था |

आधी रात बीत जाने पर भी बुलबुल बेचारी सो न सकी और उसने घर छोड़ने का फैसला कर लिया | वह रात्रि के अंधेरे में चुपचाप घर से निकल पड़ी और चलते-चलते एक जंगल में पहुंच गई | उसे जोर की भूख लगी थी | सामने ही जामुन का पेड़ था, वह जैसे-तैसे उस पर चढ़ गई और जामुन खाने लगी | पेट भर जाने पर वह नीचे उतर आई |

अब तक दिन निकल चुका था | वह जंगल में इधर-उधर खेलती रही | बुलबुल खुश थी कि आज उसे रोकने-टोकने वाला कोई नहीं था | खेलने में उसे बड़ा आनन्द आ रहा था, क्योंकि घर पर खेलना उसके नसीब में न था |

रात्रि होने पर बुलबुल को डर लगने लगा | उसे अंधेरे से डर लग रहा था अत: वह एक कोने में दुबक कर बैठ गई | थोड़ी ही देर में उसे सर्दी-सी महसूस होने लगी | ज्यों-ज्यों रात्रि बीत रही थी, ठंड बढ़ती जा रही थी | बुलबुल स्वयं को बचाने के लिए सिकुड़ती जा रही थी | उसे कंपकंपी आ रही थी, अत:उसने आंखें बंद कर लीं और सोने का प्रयास करने लगी | परंतु कुछ ही क्षण में उसे अपने सामने तेज रोशनी सी महसूस हुई |

बुलबुल ने आंखें खोलीं तो देखा कि सामने एक बूढ़ी औरत बाल खोले खड़ी थी | उसने सफेद साड़ी पहनी हुई थी | उसके बाल भी सफेद थे | बुलबुल उसे देखकर घबराने लगी, परंतु वह औरत बोली - "बेटी घबराओ नहीं, तुम्हारा क्या नाम है ? मैं शरद् ऋतु हूं | मेरे आने से हर तरफ सर्दी बढ़ जाती है, क्या तुम्हें सर्दी अच्छी लगती है ?"

बुलबुल ने कहा - "मेरा नाम बुलबुल है | मुझे सर्दी की ऋतु में बहुत आनंद आता है | सर्दी के फल संतरे, सेब अंगूर, सभी मुझे अच्छे लगते हैं | मुझे सर्दियों में धूप में खेलना और सोना बहुत अच्छा लगता है | तुम बहुत अच्छी हो मां |"

बुलबुल की बात सुनकर सर्दी खुश हो गई और बुलबुल को एक मोटा मखमली कम्बल देते हुए बोली - "लो यह ओढ़ लो | तुम्हें सर्दी लग रही है | यह थैली रख लो, इसमें ढेर सारा धन और कीमती गहने हैं | यह तुम्हारे लिए मेरा उपहार है, ये तुम्हारी जिन्दगी में काम आएंगे |"

सर्दी की बुढ़िया बुलबुल को उपहार देकर अदृश्य हो गई | बुलबुल सारे उपहार पाकर बेहद खुश हुई | उसने थैली को बगल में दबा लिया और कम्बल ओढ़कर सोने का प्रयत्न करने लगी | कम्बल की गर्माहट से कुछ ही क्षणों में बुलबुल को नींद आ गई |

थोड़ी देर में बुलबुल को गर्मी-सी महसूस होने लगी | बुलबुल ने कम्बल उठाकर आंखें खोलीं तो देखा कि एक सुंदर व जवान युवती खड़ी थी | उस युवती ने गहरे हरे व पीले वस्त्र पहने हुए थे | उसकी आंखों में चमक थी | उसने बुलबुल को देखकर कहा - "क्या तुम जानती हो कि मैं कौन हूं ?"

बुलबुल ने न में सिर हिलाया तो युवती बोली - "मैं ग्रीष्म सुंदरी हूं | मेरे आने से गर्मियों की ऋतु आरंभ हो जाती है | अच्छा, यह बताओ कि तुम्हें गर्मी की ऋतु कैसी लगती है |"

बुलबुल को खूब गर्मी लगने लगी थी | वह कंबल को एक तरफ खिसकाते हुए बोली - "ग्रीष्म ऋतु में तो मुझे बहुत आनंद आता है | गर्मियों में आम, तरबूज, खरबूजे सभी कुछ खाने में बेहद आनंद आता है | मैं तो कच्चे आम भी पेड़ों से तोड़कर खूब खाती हूं और हां आइसक्रीम का मजा तो गर्मियों में ही आता है |सच, मुझे ग्रीष्म ऋतु बहुत पसंद है |"

बुलबुल की बात सुनकर ग्रीष्म खिलखिलाकर हंस पड़ी और बोली - "सच, तुम बहुत प्यारी लड़की हो, तुमने मेरा दिल खुश कर दिया | मैं तुम्हें कुछ इनाम देना चाहती हूं | यह लो यह प्लेट तुम्हारे लिए है | इस प्लेट में उंगली रखकर जो खाने की इच्छा करोगी, वही हाजिर हो जाएगा |"

यह कहकर ग्रीष्म सुंदरी गायब हो गई | बुलबुल बहुत खुश थी कि दो ऋतुएं उससे प्रसन्न होकर इनाम दे गई थीं | बुलबुल ने घमंड करना नहीं सीखा था | वह शांत स्वभाव की थी | वह सोने का प्रयास करने लगी, तभी उसे चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई पड़ी | बुलबुल ने महसूस किया कि सुबह होने वाली है | वह रात को जागती रही थी, अत: उसे भूख महसूस हो रही थी |

बुलबुल ने प्लेट निकाल कर उस पर अपनी उंगली रख दी और इच्छा की कि उसके लिए दूध हाजिर हो जाए | उसने आंखें खोलीं तो देखा कि प्लेट में दूध भरा गिलास रखा था |

बुलबुल दूध खत्म करने ही वाली थी कि उस यूं महसूस हुआ कि उसके ऊपर पानी की बूंदें टपक रही हैं | बुलबुल ने सिर ऊपर उठाया तो देखा कि एक सुंदर स्त्री हरे कपड़े पहने खड़ी थी | वह स्त्री बुलबुल के काफी पास आ गई थी | उसके कपड़े गीले थे और बालों से पानी टपक रहा था | वह बोली - "बुलबुल क्या तुम जानती हो कि मैं कौन हूं ? मैं बताती हूं कि मैं कौन हूं ?"

बुलबुल सुनकर थोड़ा हैरानी से देखने लगी, तभी स्त्री बोली - "मैं वर्षा ऋतु हूं | मेरे आने से चारों ओर हरियाली छा जाती है | हर पेड़-पौधे में जान आ जाती है | अच्छा, तुम बताओ कि तुम्हें बरसात का मौसम कैसा लगता है ?"

बुलबुल हंसते हुए बोली - "अरे बारिश में तो मुझे बेहद आनंद आता है | मैं बारिश में खूब खेलती हूं, नृत्य करती हूं | पानी में कागज की नाव डालकर उनके पीछे-पीछे जाने में मुझे बहुत अच्छा लगता है | वर्षा ऋतु में मीठे जामुन मुझे बहुत भाते हैं |"

वर्षा ऋतु बोली - "यह बताओ कि क्या तुम्हारी मां तुम्हें वर्षा में नृत्य करने देती है ? क्या वह तुम्हें प्यार करती है ?"

बुलबुल बोली - "क्यों नहीं, मेरी मां बहुत अच्छी है और मुझे बहुत प्यार करती है | वह मुझे किसी काम को मना नहीं करती | मुझे मां के पास जाना है |"

यह कहकर बुलबुल रोने लगी | उसे मां की याद आने लगी थी |

वर्षा ऋतु बोली - "बेटी रोओ नहीं | मैं तुम्हें यह चटाई देती हूं | इस पर बैठकर तुम बिल्कुल अभी अपनी मां के पास पहुंच जाओगी | यह अंगूठी रख लोग जो चमत्कारी है और सदैव तुम्हें मुश्किलों से बचाएगी |"

इतना कहकर वर्षा ऋतु ओझल हो गई | बुलबुल को अपनी मां की याद सता रही थी | उसने चटाई बिछाई और अपना सारा सामान लेकर उसके ऊपर बैठ गई | कुछ ही क्षणों में वह अपने घर पहुंच गई |

बुलबुल ने देखा कि उसकी मां पड़ोसिनों को बुलबुल के गायब होने के बारे में बता रही थी, परंतु बुलबुल को सामने देखकर दुखी हो गई परंतु वह कुछ नहीं कर सकती थी | बुलबुल ने ज्यों ही सारे उपहार मां को दिए तो मां खुश हो गई और उनके बारे में विस्तार से पूछने लगी |

बुलबुल ने सारी बातें मां को सच बता दीं | मां ने बुलबुल की अंगूठी जबरदस्ती उतारने की कोशिश की परंतु उतार न सकी | मां को लालच आ गया और उसने रीना को भी जंगल भेजने का निश्चय किया |

रीना को जंगल जाने में डर लग रहा था, परंतु मां के कहने से व नए उपहारों के लालच में वह जंगल की ओर रवाना हो गई | वह चलते-चलते वहां पहुंच गई जहां बुलबुल गई थी |

रात को उसी प्रकार शरद् ऋतु स्त्री के वेश में आई और अपना प्रश्न रीना से पूछा कि मैं कैसी लगती हूं | रीना ने कभी मीठा बोलना सीखा ही न था | उसने सोचा कि बुलबुल को सच बताने का इनाम मिला है | वह तुनकते हुए बोली - "मुझे सर्दी की ऋतु बिल्कुल अच्छी नहीं लगती | इस मौसम में धूप नहीं निकलती और मुझे धूप में बैठने की इच्छा होती है | ज्यादा सर्दी के कारण मैं अपनी सहेलियों के साथ खेल भी नहीं पाती | सर्दी में मैं बिस्तर में ही बैठी रहती हूं | मेरी बहन बुलबुल मेरा काम करती रहती है |"

सर्दी ऋतु क्रोधित हो उठी | उसने रीना को एक थैली और कम्बल दिया और गायब हो गई | रीना ने कम्बल ओढ़ा तो उसे यूं लगने लगा कि उसे कीड़े काट रहे हों | उसने देखा कि थैली में भी कीड़े भरे थे | थैली को फेंक कर वह सोने का प्रयास करने लगी, तभी ग्रीष्म सुंदरी आ गई और पूछने लगी कि उसे गर्मी ऋतु कैसी लगती है |

रीना बोली - "यह ऋतु तो बड़ी ही गंदी होती है | हरदम पसीना आता रहता है, मुझे तो ज्यादा गर्मी के कारण खेलने को भी नहीं मिलता | गर्मी के पसीने से भरे मेरे नए कपड़े खराब हो जाते हैं | गर्म लू के कारण मेरी तबीयत खराब हो जाती है |"

ग्रीष्म सुंदरी ने क्रोधित होकर उसे एक प्लेट दी और गायब हो गई | रीना ने प्लेट में ज्यों ही हाथ रखा प्लेट में तरह-तरह के कीड़े रेंगने लगे | रीना ने घबरा कर प्लेट फेंक दी | चारों तरफ कीड़े रेंगने लगे तो रीना को डर लगने लगा |

तभी वर्षा सुंदरी आ गई | उसने भी रीना से वही सवाल पूछा कि उसे वर्षा ऋतु कैसी लगती है | रीना परेशान थी और समझ नहीं पा रही थी कि क्या जवाब दूं | वह बोली - "बारिश का मौसम अभी ऋतुओं से गंदा है | जगह-जगह पानी भर जाता है और मैं खेल नहीं पाती | कभी-कभी स्कूल भी नहीं जा पाती | बारिश में बदन चिपचिपा रहता है | खाने की चीजें सड़ने लगती हैं और कुछ चीजें सीलकर बेस्वाद हो जाती हैं | सच मुझे वर्षा ऋतु से नफरत है |"

रीना का उत्तर सुनकर वर्षा ऋतु क्रोधित हो गई | उसने रीना को अंगूठी व चटाई दी और अन्तर्धान हो गई | रीना ज्यों ही चटाई पर बैठी उसे महसूस हुआ कि उसे आग जैसी तपिश महसूस हो रही है | तभी उसने अंगूठी पहनी | अंगूठी से तेज आग निकली और रीना लपटों से घिर गई |

तभी रीना की मां वहां पहुंच गई, उसने मुश्किल से आग को बुझाया, रीना काफी जल चुकी थी | वह मां से बोली - "मां, तुमने मुझे कभी सही बातों की शिक्षा नहीं दी, मैं सदैव सबसे बुरा बोलती रही, बुलबुल को डांटती रही | तुम भी बुलबुल के साथ बुरा व्यवहार करती रहीं, तभी भगवान ने हमें यह सजा दी है |"

बुलबुल आकर अपनी बहन को प्यार करने लगी | यह देखकर मां को एहसास हुआ कि बुलबुल कितनी अच्छी लड़की है, उसके साथ दुर्व्यवहार करके मैंने गलती की है | मैं मां हूं और मां के लिए सारे बच्चे एक समान होते हैं | मैंने रीना को अच्छी बातें न सिखाकर उसका भी बुरा किया और अपना भी |"

मां ने निश्चय किया कि अब वह दोनों बेटियों को समान प्यार करेगी | कुछ दिन में रीना ठीक हो गई और सब मिल-जुलकर सुख से रहने लगे | 

Saturday, 1 April 2017

เคตिเคฆेเคถी เคฒोเค•เค•เคฅा : เค…เคจोเค–ी เคคเคฐเค•ीเคฌ

                   श्रीलंका की लोककथा

                        अनोखी तरीकीब

देवधर और मंगल की मित्रता ऐसी थी, जैसे दोनों एक ही शरीर के दो अंग हों | यदि एक को चोट लगती तो तकलीफ दूसरे को होती | वे दोनों बचपन से ही मित्र थे |

अब उनकी मित्रता इतनी पुरानी हो चुकी थी कि लोग उसकी दोस्ती का उदाहरण देते थे | देवधर और मंगल बड़े हो चुके थे | दोनों का अलग-अलग व्यापार था | एक दिन दोनों ने तय किया कि वे दोनों मिलकर व्यापार करेंगे | 

फिर दोनों ने मिलकर व्यापार शुरू कर दिया | उनका व्यापार चल निकला और दोनों खूब अमीर हो गए | वे ठाठ-बाट से रहने लगे | धीरे-धीरे एक समय आया कि दोनों का विवाह हो गया |

उनको साथ-साथ व्यापार करते 7-8 वर्ष बीत चुके थे | तभी देवधर के मन में न जाने कहां से बेईमानी आ गई और वह व्यापार में हेरा-फेरी करने लगा | मंगल बहुत सीधा और नेक इंसान था | उसे इस गड़बड़ी की भनक तक नहीं लगी | देवधर व्यापार में घाटा दिखाता जा रहा था | एक दिन ऐसा आया कि मंगल उस व्यापार का भागीदार ही नहीं रहा | मंगल ने ऐसा धोखा जिन्दगी में पहली बार खाया था |

धीरे-धीरे वह बहुत चुप रहने लगा | वह किसी से भी बात नहीं करता था | वह न हंसता था, न बोलता था | इस कारण उसकी पत्नी बहुत परेशान रहने लगी | एक तरफ तो घर में आर्थिक तंगी रहने लगी, दूसरी तरफ मंगल बीमार रहने लगा |

मंगल की पत्नी शन्नो ने डॉक्टर-वैद्य से खूब इलाज कराया, किंतु कोई फायदा नहीं हुआ | किसी डॉक्टर को उसकी बीमारी समझ में नहीं आती थी | मंगल दिन पर दिन कमजोर होता जा रहा था |

दूसरी तरफ देवधर अपने आपमें मस्त था | उसने हेरा-फेरी करके खूब धन जमा कर लिया था | अब अपना अलग व्यापार करके खूब धन कमा रहा था | अपनी पत्नी के लिए उसने ढेरों गहने बनवा दिए थे | गांव के लोग ऐसा विश्वासघात देखकर कानों पर हाथ रख लेते थे | लोगों को देवधर की बेईमानी का खूब पता था, लेकिन कोई भी खुलकर सामने नहीं आता था |

एक दिन मंगल का चचेरा भाई सोमदत्त शहर से आया | वह मंगल की हालत देखकर हैरान रह गया | मंगल की पत्नी ने चिन्तित होते हुए कहा - "देवर जी, अपने भैया का कुछ इलाज कराओ, हम तो गांव में इलाज करवा के हार गए, परंतु कोई फायदा नहीं हुआ |"

सोमदत्त ने शन्नो से मंगल की हालत के बारे में विस्तार से जानकारी ली और बोला - "भाभी, मंगल का इलाज डॉक्टर-वैद्य के पास नहीं है | उसका इलाज कुछ और ही है |"

फिर सोमदत्त ने शन्नो को बताया कि जब तक देवधर मंगल से माफी नहीं मांगेगा | मंगल ठीक नहीं होगा | परंतु शन्नो ने बताया कि देवधर अब बहुत धनी और घमंडी हो गया है, उसका माफी मांगना नामुमकिन है | हम गरीब उसके सामने टिक नहीं सकेंगे |

सोमदत्त ने कहा कि मैं इस नामुमकिन को मुमकिन करके दिखाऊंगा | मैं बिना धन के ही उसे नीचा दिखाऊंगा | उसने अगले दिन से ही अपनी योजना पर काम करना शुरू कर दिया |

अगले दिन जब देवधर अपने घोड़े पर बैठकर अपनी दुकान जा रहा था तो उसने देखा कि एक आदमी ने उसकी तरफ देखा और जोर से हंस दिया |

देवधर को लगा कि कोई यूं ही हंस रहा होगा | वह थोड़ी ही दूर गया था कि चार लोग खड़े आपस में बातें कर रहे थे | वह जैसे ही उन चारों के सामने से गुजरा, उनमें से एक ने उसकी तरफ देखा और कुछ कहा कि सारे लोग जोर-जोर से हंसने लगे |

देवधर को लगा कि सब लोग उसकी तरफ देखकर हंस रहे हैं | हो सकता है कि उसकी पगड़ी टेढ़ी हो, उसने पगड़ी को ठीक करने का प्रयास किया तो घोड़े से गिरते-गिरते बचा |

अब वह अपनी दुकान पहुंच चुका था | ज्यों ही उसने दुकान का ताला खोला, एक छोटा-सा बालक उधर से जोर-जोर से हंसता हुआ गुजरा | देवधर को अब थोड़ा क्रोध आने लगा था | उसने बालक को बुलाकर पूछा - "ऐ लड़के क्यों हंसता है ?"

लड़के ने कहा - "यूं ही" और चला गया |

देवधर का मन आज दुकान में नहीं लग रहा था | उसे लगता था कि आज जरूर कहीं कोई गड़बड़ है | कभी वह शीशे में देखता, कभी अपने कपड़ों पर निगाह दौड़ाता, परंतु उसे समझ न आता |

दोपहर को एक दाढ़ी वाला व्यापरी उसकी दुकान पर आया  और उससे बड़ा सौदा तय कर लिया | परंतु देवधर का ध्यान आज कहीं और था | उस दाढ़ी वाले व्यापारी ने 2-3 बार अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा और देवधर की ओर देखकर जोर-जोर से हंसने लगा, फिर बोला - "सेठ, सौदा फिर कभी करूंगा |"

देवधर को लगा कि उसकी दाढ़ी में कुछ लगा है, वह बार-बार अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरने लगा | जैसे-तैसे दिन बीता | आज उसका व्यापार में मन नहीं लगा था, इस कारण बिक्री भी कम हुई थी |

घर जाकर देवधर ने सारी बात अपनी पत्नी को बताई, वह सुनकर परेशान हो गई | उसके उसके कपड़ों, पगड़ी व दाढ़ी पर निगाह डाली, उसे सब कुछ ठीक-ठीक लगा |

अगले दिन फिर जब वह कहीं काम से जा रहा था तो फिर उसने लोगों को कानाफूसी करते व हंसते देखा | अब उसे हर समय यही लगने लगा कि हो न हो, लोग उसकी बेईमानी की चर्चा कर रहे हैं | उसने दो-चार बार लोगों की बात सुनने की कोशिश की तो उसे अपने बारे में एक भी शब्द सुनाई नहीं दिया |

अब वह जहां जाता लोग हंसते दिखाई देते | उसने सोचा कि लोग यूं ही उसका मजाक बना रहे हैं, उसे उन सबको सबक सिखाना चाहिए | अगले दिन जब कोई व्यक्ति उस पर हंसा तो वह चिल्ला कर बोला - "पागल, पागल कहीं का |"

उधर से उस व्यक्ति ने भी वही शब्द दोहरा दिए | सुनकर देवधर क्रोध से आगबबूला हो उठा | धीरे-धीरे एक सप्ताह में हालत यह हो गई कि वह जिधर से निकलता लोग कहते - "पागल, पागल कहीं का |" सुनकर वह बौखला उठता और सचमुच पागलों जैसी हरकतें करने लगता | उसका व्यापार मंदा पड़ने लगा | धीरे-धीरे उसकी हालत खराब होने लगी |

अगले दिन गांव के जमींदार के यहां उसके बेटे की शादी थी | जमींदार ने सारे गांव के लोगों को दावत पर बुलाया | देवधर भी खूब अच्छे कपड़े पहन सज-धज कर दावत खाने पहुंचा | सोमदत्त भी वहां पहुंच गया |

जमींदार खुशी से लोगों से मिल रहा था और उनका अभिवादन कर रहा था | सोमदत्त जमींदार के पास जाकर फुसफुसाकर बोला - "आप गांव के सबसे धनी व्यक्ति से नहीं मिलेंगे | ये जो सामने दाढ़ी वाले सज्जन हैं, वो अपने आपको आपसे भी बड़ा जमींदार समझते हैं |"

जमींदार खुशी के मूड में था | बात को मजाक में लेते हुए उसने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा फिर हंस कर देवधर की ओर देखा और बोला - "अरे यह तो बड़ा भला आदमी है |" फिर आगे बढ़ गया | देवधर को लगा कि वह व्यक्ति वही आदमी है जो पहले दिन उसे देखकर हंसा था | उसके बाद ही सब लोग उसकी तरफ देखकर हंसने लगे | हो न हो यह कोई राज की बात है, जो आज जमींदार भी हंस रहा है | वह व्यक्ति उसकी कोई शिकायत कर रहा है या उसकी दाढ़ी में कोई गड़बड़ है | उसने झट से अपनी दाढ़ी में हाथ फेरा और परेशान हो उठा |

वह झट से सोमदत्त से मिलने भागा, परंतु वह तब तक गायब हो चुका था |

अगले दिन सुबह देवधर ने सबसे पहले दाढ़ी-मूंछें साफ करवाईं, फिर सोमदत्त को ढूंढ़ने निकल पड़ा | उसके मन में जमींदार की बात जानने की बेचैनी थी | थोड़ी ही दूर जाने पर उसे सोमदत्त जाता दिखाई दिया | उसने सोमदत्त से रात की बात पूछी तो सोमदत्त ने कहा - "मैं एक ही शर्त पर तुम्हें जमींदार की बात बता सकता हूं | तुम्हें मेरी एक बात माननी पड़ेगी |"

देवधर बोला - "भैया, धन मांगने के अलावा जो तुम कहो वही मानूंगा |" यह सुनकर सोमदत्त देवधर को पास ही मंगल के घर ले गया और बोला - "पहले इनसे माफी मांगो फिर बताऊंगा |"

देवधर ने पलंग पर लेटे व्यक्ति से तुरंत माफी मांग ली, "भैया मुझे माफ कर दो |" तो वह व्यक्ति पलंग से उठ कर बैठ गया | उसके चेहरे पर पतली-सी मुस्कान की रेखा खिंच गई | देवधर यह देखकर हैरान रह गया कि वह उसका अपना मित्र मंगल था | उसकी इतनी दुर्बल और बीमार हालत के कारण वह अपने बचपन के मित्र को पहचान नहीं सका था | उसे पश्चाताप होने लगा |

तभी सोमदत्त ने बताया कि जमींदार ने तो उसकी प्रशंसा की थी | लेकिन सोमदत्त पश्चाताप की अग्नि में जल रहा था | उसने अपने मित्र से अपने किए पर पुन: माफी मांगी और गले से लगा लिया |

धीरे-धीरे मंगल अच्छा होने लगा | दोनों में फिर दोस्ती हो गई फिर उनकी दोस्ती जीवन भर चलती रही |