Wednesday, 26 April 2017

เคตिเคฆेเคถी เคฒोเค•เค•เคฅाเคँ : เคตเคซाเคฆाเคฐी

                 अफ़्रीका की लोककथा

                         वफादारी

बहुत पहले की बात है | अफ्रीका में मंडल नाम का एक व्यक्ति रहता था | उसके पास ढेरों गाएं थीं | इसके अतिरिक्त बकरियां, हिरन व घोड़े भी उसने पाल रखे थे |

मंडल अपने जानवरों को बहुत प्यार करता था | परंतु इतने सारे जानवरों की देखभाल करना आसान नहीं था | उन जानवरों के चारे की व्यवस्था व देखभाल के लिए मंडल ने पिट्ठू नाम का एक लड़का रख लिया | 

कुछ ही दिनों में सभी जानवर पिट्ठू से हिल-मिल गए | पिट्ठू उन सभी जानवरों से बहुत प्यार करता था | इस कारण ऐसा जान पड़ता था कि मानो वह इन जानवरों की भाषा जानता हो | जिस जानवर को जिस चीज की जरूरत होती, वह चीज वह उसके लिए ले जाता |

कभी किसी जानवर को चारे की जरूरत होती तो कभी पानी की, कभी नहाने की | अकेला पिट्ठू उन सबकी उचित देखभाल करता था | इस कारण वे सभी जानवर भी पिट्ठू को प्यार करने लगे थे | पिट्ठू उन जानवरों को सीटी बजाकर एक जगह इकट्ठा कर लेता था | सीटी बजते ही सभी जानवर अपना भोजन तक छोड़कर पिट्ठू के पास आ जाते थे |

मंडल को पिट्ठू के होते अपने जानवरों की फिक्र करने की आवश्यकता नहीं थी | पिट्ठू गायों को चराने पास के जंगल में ले जाता था | वह प्रतिदिन सुबह गायों को ले जाता और शाम को गायों को वापस ले आता | पिट्ठू हर समय इस बात का ध्यान रखता था कि कोई जंगल जानवर किसी गाय पर अचानक हमला न कर दे |

एक दिन पिट्ठू जंगल में गाएं चरा रहा था कि अचानक डाकुओं ने हमला बोल दिया | पिट्ठू डाकुओं के इस हमले के लिए तैयार न था, अत: एकदम समझ ही न पाया कि उसे क्या करना चाहिए | वह झट से एक झाड़ी में छिप गया |

डाकुओं ने मोटी ताजी गायों का इतना बड़ा झुंड देखा तो बहुत खुश हुए | डाकुओं का सरदार बोला - "आज पहली बार इतनी तंदुरुस्त गायों का झुंड हमारे हाथ लगा है, जल्दी से इन्हें हांक कर ले चलो |"

सारे डाकू गायों को जंगल के दूसरे रास्ते की ओर हांकने लगे | लेकिन ऐसा प्रतीत होता था कि मानो सारी गायें बहरी हों और किसी का इशारा न समझती हों | वे जहां की तहां खड़ी रहीं | कुछ गाएं घास चरती रहीं, कुछ बैठी जुगाली करती रहीं |

डाकू परेशान थे कि गाएं आखिर बढ़ क्यों नहीं रहीं ? उन्होंने गायों को डंडों के जोर पर हांकना आरंभ कर दिया | परंतु गाएं फिर भी टस से मस नहीं हुईं |

डाकुओं के सरदार को क्रोध आने लगा और वह गायों को किसी भी तरह आगे बढ़ाने के लिए अपने साथियों को आदेश देने लगा | तभी एक डाकू बोला - "सरदार लगता है इन गायों का कोई चरवाहा दोस्त है, जो यहीं कहीं छिपा है | जिनकी आज्ञा के बिना ये यहां से आगे नहीं बढ़ रही हैं |"

सरदार को अपने साथी की बात जंच गई | वह बोला - "फिर तो इन गायों का दोस्त यहीं-कहीं छिपा होगा | तुम लोग मिलकर उसे ढूंढ़ निकालो |"

पिट्ठू पौधों व झाड़ियों की ओट में छिपा डाकुओं की बातचीत सुन रहा था | एक तरफ उसे डाकुओं से डर लग रहा था, दूसरी तरफ गायों के व्यवहार को देखकर उसे बहुत खुशी हो रही थी |

सारे डाकू घोड़ों से उतर कर चरवाहे को इधर-उधर ढूंढ़ने लगे | तभी मौका पाकर पिट्ठू एक पेड़ के खोखले तने में घुस कर खड़ा हो गया |

काफी देर तक कोई चरवाहा न मिलने पर दो-तीन डाकू अपने-अपने घोड़ों पर चढ़कर घनी घास में चरवाहे को ढूंढ़ने का प्रयास करने लगे | ढूंढ़ते-ढूंढ़ते एक डाकू का घोड़ा उसी पेड़ के आगे खड़ा हो गया जिसमें पिट्ठू छिपा बैठा था | घोड़े की पूंछ के बाल पिट्ठू के मुंह से छूने लगे | अचानक कुछ बाल पिट्ठू की नाम में घुस गए और पिट्ठू को छींक आ गई |

डाकू ने लपक कर पिट्ठू को पकड़ लिया और तने के बाहर खींच लिया | पिट्ठू को डाकुओं के सरदार के सामने उपस्थित किया गया | सरदार ने पूछा - "क्या इन गायों को तुम्हीं चराते हो ?"

पिट्ठू ने डरते-डरते हामी भर दी | डाकुओं के सरदार ने आदेश दिया - "इस छोकरे को अपने घोड़े पर बिठा लो और छोकरे से कहो कि वह गायों को अपने साथ चलने का आदेश दे |"

पिट्ठू ने एक सीटी बजाई, सारी गाएं एक साथ आकर खड़ी हो गईं | डाकुओं ने पिट्ठू को अपने घोड़े पर बिठा लिया | पिट्ठू ने इशारे पर सारी गाएं उन घोड़ों के पीछे चल दीं | डाकू काफी दूर तक चलते रहे | गाएं भी चुपचाप चलती रहीं | हालांकि गाएं थक चुकी थीं, परंतु पिट्ठू के इशारे के कारण चलती जा रही थीं |

ऊबड़-खाबड़ और पथरीले पहाड़ी रास्ते आने लगे, परंतु डाकू अपने घोड़ों पर चलते रहे, साथ ही गाएं भी चलती रहीं | आखिर एक जगह जाकर डाकू रुक गए | यहीं डाकुओं का अड्डा था | डाकुओं ने सारी गायों को बांध दिया |

डाकुओं के सरदार ने आदेश दिया - "आज इन सारी गायों का दूध दुह कर सबके दूध पीने का इंतजाम करो | कल को इस काली वाली गाय का मांस हमें भोजन में चाहिए | अत: इसे अच्छी तरह चारा खिला दो |"

ठीक वैसा ही किया गया | रात्रि हो गई तो सभी डाकू थक कर सो गए, लेकिन पिट्ठू की आंखों में नींद नहीं थी | वह यह सोचकर बेचैन हुआ जा रहा था कि कल एक गाय को मार दिया जाएगा | इस तरह तो डाकू सारी गायों को मार डालेंगे | पिट्ठू परेशान था कि किस तरह डाकुओं के बंधन से मुक्ति पाई जाए |

पिट्ठू ने सोचा कि डाकुओं के चंगुल में फंस कर भी जान खतरे में है तो क्यों न जान पर खेल कर खुद को व गायों को बचा लूं | उसने अंधेरे में उठ कर गायों की रस्सी खोल दी | फिर गायों को धीमे से आवाज लगा कर शहर की ओर चल दिया | उसने देखा कि सभी गाएं उसके पीछे आ रही थीं | वह बिना पीछे मुड़े चलता रहा | रात्रि बीतने को थी | सुबह की लालिमा दिखाई देने लगी थी | पिट्ठू ने देखा कि सभी गाएं सही-सलामत पीछे आ गई थीं |

पिट्ठू सभी गायों को लेकर उनके मालिक मंडल के पास गया | मंडल शाम को गायों के वापस न आने से बहुत परेशान था | वह इतनी सुबह भी गायों के इंतजार में बाहर ही टहल रहा था |

पिट्ठू को दूर से आता देख मंडल उसे घर ले आया | पिट्ठू ने मंडल को सारी घटना सुनाई | घटना सुनकर मंडल की आंखों में आंसू निकल पड़े | उसने पिट्ठू को गले से लगा लिया और सभी गायों पर हाथ फेरते हुए उन्हें खूब प्यार करने लगा | उन्हें देख कर यूं लगता था कि वो आपस में बरसों बाद मिल रहे हों | 

เคตिเคฆेเคถी เคฒोเค•เค•เคฅा : เคธौเคฆाเค—เคฐ

                   ग्रीस की लोककथा

                         सौदागर

एंडी और मैंडी बहुत पक्के मित्र थे | वे बचपन से ही स्कूल में साथ पढ़े थे | जब वे युवा हुए तो उन्होंने तय किया कि वे दोनों अपना व्यापार भी एक साथ करेंगे |

दोनों ने मिलकर कपड़े का व्यापार शुरू किया और उनका व्यापार खूब अच्छा चल निकला | वे दोनों विवाह करके घर बसाने की सोचने लगे, लेकिन तभी उनके व्यापार को किसी की नजर लग गई | किस्मत ने उनका साथ छोड़ दिया और व्यापार धीरे-धीरे ठप होने लगा |

एक दिन एंडी बोला - "दोस्त, क्यों न हम कहीं और चल कर किस्मत आजमाएं ? हमारा व्यापार मंदा होता जा रहा है | यदि यही हाल रहा तो हमें भोजन के भी लाले पड़ जाएंगे | इससे तो अच्छा है कि हम किसी दूसरे देश जाकर नया व्यापार शुरू कर दें |"

मैंडी बोला - "एंडी तुम ठीक कहते हो | हमें धीरे-धीरे यहां का काम बंद कर देना चाहिए | ताकि पैसा इकट्ठा करके कहीं और व्यापार कर सकें |"

दो महीने के भीतर दोनों मित्रों ने मिलकर अपना व्यापार बंद कर दिया | अपने धन को अशर्फियों के रूप में लेकर वे अपने घोड़ों पर सवार होकर चल दिए | दो दिन में वे दूसरे देश पहुंच गए |

दोनों ने वहां जाकर एक सराय में अपना समान रख दिया | रात्रि में मैंडी बोला - "एंडी, मैं हजार अशर्फी और घोड़ा लेकर जाता हूं और देखता हूं कि व्यापार का कोई इंतजाम हो जाए | तब तक तुम यहीं मेरा इंतजार करो |"

एंडी बोला - "मित्र, जरा संभल कर जाना, न जाने यहां के लोग कैसे हों ?"

मैंडी को व्यापार का अच्छा तजुर्बा था, वह बोला - "फिक्र न करो मित्र | अच्छा मैं चलता हूं | शाम तक लौट आऊंगा |"

थोड़ी ही दूर जाने पर एक व्यक्ति ने पूछा - "क्यों भैया, क्या घोड़ा बेचने जा रहे हो ?"

मैंडी बोला - "कोई खास इरादा तो नहीं है | पर कोई अच्छा खरीदार मिल जाए तो बेच भी सकता हूं |"

वह व्यक्ति बोला - "मैं तुम्हारा घोड़ा खरीदने को तैयार हूं | बताओ, तुम्हारे घोड़े की कीमत क्या है ?"

मैंडी ने सोचा मुझे घोड़ा बेचना तो है नहीं, पर यदि इसकी अच्छी कीमत मिल जाए तो बेचने में कोई हर्ज भी नहीं है | वैसे भी यह घोड़ा बूढ़ा हो गया है | इसके दाम ठीक मिल गए तो इसके बदले दूसरा अच्छा घोड़ा खरीद लूंगा | मैंडी बोला - "मेरे घोड़े की कीमत तो पांच सौ अशर्फी है |"

वह व्यक्ति बोला - "मैं यहीं का दुकानदार हूं | तुम कोई अजनबी जान पड़ते हो | यहां तो घोड़ा सौ अशर्फी में मिल जाता है |"

मैंडी बोला - "लेना हो तो लो, इसकी कीमत कम नहीं होगी | क्या नाम है तुम्हारा ?"

वह व्यक्ति बोला - "मेरा नाम रशैल है | मुझे तुम्हारा घोड़ा पसंद है | यह लो पांच सौ अशर्फी, अब घोड़ा मेरा हुआ |"

मैंडी ने खुश होकर पांच सौ अशर्फी ले लीं और घोड़े से उतरकर घोड़े की जीन खोलने लगा ताकि अपनी अशर्फियां निकाल सके | लेकिन रशैल मैंडी से बोला - "अब यह घोड़ा मेरा हुआ तो इस पर से तुम कुछ नहीं ले सकते | हम यहां के व्यापारी हैं और जुबान के बड़े पक्के होते हैं | सौदा तय करते समय यह कतई तय नहीं हुआ था कि तुम इसकी जीन या कोई सामान उतार लोगे | अत: तुम घोड़े को हाथ भी नहीं लगा सकते |"

मैंडी बहुत परेशान था कि अब क्या करे ? इतने में रशैल घोड़े पर बैठ कर उसे तेज दौड़ाता हुआ शहर की तरफ चला गया | मैंडी बहुत दुखी होता हुआ सराय लौट आया और अपने मित्र एंडी को सारी बात विस्तार से बताई | एंडी को रशैल की चालाकी पर बहुत क्रोध आया और उसने मन ही मन उससे बदला लेने का निश्चय किया |

अगले दिन सुबह एंडी तैयार होकर बोला - "मैंडी, मैं शहर जा रहा हूं व्यापार के लिए कुछ न कुछ इंतजाम करके लौटूंगा | तब तक तुम यहीं आराम करो |"

मैंडी बोला - "ये पांच सौ अशर्फियां साथ लेते जाओ |"

एंडी ने हंसते हुए जवाब दिया कि उसके लिए पच्चीस अशर्फियां ही काफी हैं | फिर वह पच्चीस अशर्फियां लेकर चल दिया | शहर में जाकर उसने रशैल की दुकान के बारे में पता किया तो पता लगा कि रशैल कसाई है और मीट बेचने का धंधा करता है |
एंडी सीधा रशैल की दुकान पर पहुंचा | उसने देखा कि रशैल की दुकान काफी बड़ी थी | ऊपर छत पर उसके बच्चे खेल रहे थे | छज्जे पर स्त्रियां बैठी काम कर रही थीं | एंडी ने दुकान में प्रवेश किया तो देखा कि बकरे के सिर और मुर्गे की टांगे लटक रही थीं | दुकान के पिछवाड़े के आंगन में घोड़ा बंधा था | रुक-रुक कर घोड़े के हिनहिनाने की आवाज आ रही थी | एंडी ने पूछा - "भैया, ये सिर और टांगे कितने की हैं ?"

रशैल बोला - "यह सिर एक अशर्फी का एक है और एक जोड़ी टांगें भी एक अशर्फी की ही हैं |"

एंडी ने पूछा - "क्या यहां सारे सिर और टांगों की कीमत एक अशर्फी ही है ?"

रशैल ने नम्रता से जवाब दिया - "हां, सभी सिर और टांग की जोड़ी की कीमत एक अशर्फी है |"

इस पर एंडी ने कुछ सोचा और पूछा - "पक्की बात है न कि हर सिर की कीमत एक अशर्फी है ?"

रशैल झुंझलाकर बोला - "कह तो दिया कि हर सिर की कीमत एक अशर्फी है, क्या लिख कर दूं ?"

एंडी ने पच्चीस अशर्फी निकाल कर रशैल के हाथ में रखी और बोला - "मुझे पच्चीस सिर चाहिए |"

रशैल बोला - "पर मेरे पास तो सिर्फ पांच तो सिर ही हैं, बाकी कल ले लेना |"

एंडी ने सख्ती दिखाते हुए कहा - "कोई नए व्यापारी हो क्या ? हम व्यापारी जुबान के बड़े पक्के होते हैं, सौदा हो गया तो हो गया | दुकान के ऊपर भी बहुत सारे सिर हैं, मुझे अभी पच्चीस सिर चाहिए |"

रशैल गिड़गिड़ाने लगा और खुशामद करने लगा | वह बोला - "भैया, मैंने तो बकरे के सिर की कीमत बताई थी, तुम्हें दावत के लिए ज्यादा मीट चाहिए तो टांगें ले लो |"

एंडी बोला - "नहीं, मुझे तो सिर ही चाहिए, वह भी बिल्कुल अभी |"

रशैल समझ गया कि यह कल वाली घटना जानता है | तुरंत खुशामद करने लगा कि मेरे बीवी - बच्चों को छोड़ दो | वह बोला - "भैया, आप मैंडी के ही कोई परिचित जान पड़ते हो | लो भइया, आप अपना घोड़ा भी ले जाओ और हजार अशर्फी भी ले जाओ | पर मेरे बीवी-बच्चों की जान बक्श दो |"

एंडी ने अपनी एक हजार अशर्फियां और घोड़ा लिया और सराय के लिए चल दिया |

Monday, 24 April 2017

เคฒोเค• เค•เคฅा : เคฐूเคชाเคฒी เค”เคฐ เคœाเคฆूเค—เคฐ

                   भारतीय लोककथा

                    रूपाली और जादूगर

सूरजगढ़ देश में एक राजा था हुकुम सिंह | उसके राज्य में सब तरफ सुख-शांति थी | प्रजा बहुत मेहनती और सुखी थी | चारों ओर हरियाली और खुशहाली का साम्राज्य था |

राजा हुकुम सिंह भी अपनी प्रजा का सुख देखकर खुश होता, पर मन ही मन वह अपनी पत्नी का दुख देखकर बहुत दुखी था | 

राजा ने साधु-महात्माओं से काफी इलाज करवाए, पूजा-पाठ की, पर कोई लाभ नहीं हुआ | प्रजा भी राजा के लिए संतान की मिन्नत कर-करके थक चुकी थी |

राजा धीरे-धीरे बूढ़ा हो चला था, तभी उसके यहां एक सुंदर पुत्री ने जन्म लिया | सारे राज्य में खुशियां छा गईं | राजा ने गरीबों को वस्त्र व भोजन दान किया तथा पूरे राज्य में दावत का ऐलान किया | हर व्यक्ति ने भी भरकर खाया और राजा को आशीष देता चला गया |

बहुत रूपवान होने के कारण राजकुमारी का नाम रूपाली रखा गया | ज्यों-ज्यों रूपाली बड़ी होने लगी, उसका रूप निखरने लगा | चांद से मुखड़े पर उसके घने घुंघराले बाल हर देखने वाले को बरबस ही आकर्षित कर लेते थे |

राजकुमारी राजकुमारों की भांति भाले-तीर चलाना सीखने लगी | वह रूपवान तो थी ही, वीर और साहसी भी थी | उसमें दुर्गुण था तो एक ही, वह बहुत जिद्दी व घमंडी थी |

राजा के बुढ़ापे की संतान होने के कारण अत्यधिक लाड़-प्यार मिलने से ही रूपाली जिद्दी बन गई थी | जो बात ठान लेती, उसे पूरा करके ही छोड़ती थी |

ज्यों-ज्यों रूपाली विवाह योग्य हो रही थी, राजा हुकुम सिंह का बुढ़ापा बढ़ रहा था | अत: वह रूपाली के विवाह के लिए चिन्तित रहने लगा |

अनेक राजकुमारों के प्रस्ताव रूपाली से विवाह के लिए आए, पर राजकुमारी रूपाली उन सभी में कोई न कोई खोट निकालकर अस्वीकार कर देती |

राजा हुकुम सिंह की चिंता बढ़ती जा रही थी | एक दिन रूपाली अपनी प्रिय सखी सलिला व घुड़सवारों के साथ शिकार के लिए निकल पड़ी | रूपाली निपुणता से घोड़े को तेज दौड़ाती हुई आगे निकल गई | अपने साथियों से बहुत दूर आने पर उसने देखा वह अकेली रह गई है | तभी उसने अपने सामने एक सुंदर हिरन देखा |

ज्यों ही रूपाली ने तीर चलाना चाहा, हिरन बोला - "राजकुमारी, तुम मुझे छोड़ दो तो मैं तुम्हें परी देश की सैर करा सकता हूं |"

राजकुमारी हिरन की बात सुनकर घोड़े से उतर गई और बोली - "जब तक मेरे सभी घुड़सवार आते हैं, तब तक मैं परीलोक की सैर कर लेती हूं |"

रूपाली को प्यास लगी थी | वह हिरन के साथ नदी किनारे पहुंच गई | वह हिरन वास्तव में जादूगर था, वह उसे पास ही जादुई नदी के पास ले गया |

ज्यों ही रूपाली ने नदी का पानी छुआ, वह पत्थर की बुत बन गई और नदी के अंदर चली गई |

उधर, घुड़सवार सारे जंगल में रूपाली को ढूंढ़कर थक गए | जब रूपाली का कहीं पता न चला तो वे निराश होकर लौट आए |

राजा ने सारे राज्य में घोषणा करा दी कि जो भी व्यक्ति राजकुमारी रूपाली को ढूंढ़ कर लाएगा, उसी के साथ राजकुमारी का विवाह कर दिया जाएगा |

अनेक व्यक्ति जंगल में राजकुमारी को ढूंढ़ने गए, पर निराश होकर लौट आए |

मंगल सुमन नामक एक युवक भी रूपाली को ढूंढ़ने अपने घोड़े पर निकला | बहुत आगे निकल जाने पर उसे वही हिरन दिखाई दिया | हिरन बहुत सुंदर था |

मंगल सुमन ने सोचा कि राजकुमारी तो मिली नहीं, क्यों न इसका आखेट कर लूं | ज्योंही उसने हिरन को निशाना बनाया हिरन पहले की भांति बोला - "मैं तुम्हें परीलोक की सैर करा सकता हूं |"

मंगल सुमन ने हिरन की बात की परवाह किए बिना तीर चला दिया | तीर हिरन के माथे में लगा और हिरन एक जादूगर बनकर गिर गया व तड़पने लगा | मंगल सुमन ने तुरंत एक तीर और चलाया और जादूगर लुढ़कता हुआ एक नदी के पास जा गिरा |

जादूगर के मरते ही नदी का जल सूख गया, अब वहां एक सुंदर महल खड़ा था |

मंगल सुमन जब महल के अंदर गया तो वहां एक सुंदर राजकुमारी व अनेक लोगों को बंदी देखा | उसने राजकुमारी से परिचय पूछा तो वह बोली - "मेरा नाम रूपाली है | मैं सूरजगढ़ के राजा हुकुम सिंह की पुत्री हूं | मैं परीलोक की सैर के लालच में जादूगर के चंगुल में फंस गई | यहां बंदी सभी लोग परीलोक के सैर के लालच में आए थे |"

मंगल सुमन ने अपना परिचय देते हुए बताया कि तुम्हारे पिता तुम्हारे लिए बहुत चिंतित हैं | चलो, अपने राज्य वापस चलो | मंगल सुमन ने वहां सभी कैदियों को मुक्त कर दिया और रूपाली को घोड़े पर बिठाकर सूरजगढ़ ले आया | राजकुमारी मंगल सुमन की वीरता से प्रभावित हो चुकी थी | अत: उसने स्वयं ही अपने पिता से मंगल सुमन की वीरता की प्रशंसा की | राजा हुकुम सिंह ने जब अपनी घोषणा के बारे में रूपाली को बताया, तो राजकुमारी के गालों पर शर्म की लाली छा गई |

राज पंडित को बुलाकर विवाह की तिथि घोषित कर दी गई और बहुत ही धूमधाम से रूपाली का विवाह मंगल सुमन से कर दिया गया तथा मंगल सुमन को अपना उत्तराधिकारी बना कर सूरजगढ़ का राज्य सौंप दिया | 

Sunday, 23 April 2017

เคตिเคฆेเคถी เคฒोเค•เค•เคฅा : เค•िเคธ्เคฎเคค

                 नेपाली लोककथा

                      किस्मत

चंदन नगर का राजा चंदन सिंह बहुत ही पराक्रमी एवं शक्तिशाली था | उसका राज्य भी धन-धान्य से पूर्ण था | राजा की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी |

एक बार चंदन नगर में एक ज्योतिषी पधारे | उनका नाम था भद्रशील | उनके बारे में विख्यात था कि वह बहुत ही पहुंचे हुए ज्यातिषी हैं और किसी के भी भविष्य के बारे में सही-सही बता सकते हैं | वह नगर के बाहर एक छोटी कुटिया में ठहरे थे | 

उनकी इच्छा हुई कि वह भी राजा के दर्शन करें | उन्होंने राजा से मिलने की इच्छा व्यक्त की और राजा से मिलने की अनुमति उन्हें सहर्ष मिल गई | राज दरबार में राजा ने उनका हार्दिक स्वागत किया | चलते समय राजा ने ज्योतिषी को कुछ हीरे-जवाहरात देकर विदा करना चाहा, परंतु ज्योतिषी ने यह कह कर मना कर दिया कि वह सिर्फ अपने भाग्य का खाते हैं | राजा की दी हुई दौलत से वह अमीर नहीं बन सकते |

राजा ने पूछा - "इससे क्या तात्पर्य है आपका गुरुदेव ?"

"कोई भी व्यक्ति अपनी किस्मत और मेहनत से गरीब या अमीर होता है | यदि राजा भी किसी को अमीर बनाना चाहे तो नहीं बना सकता | राजा की दौलत भी उसके हाथ से निकल जाएगी |"

यह सुनकर राजा को क्रोध आ गया |

"गुरुदेव ! आप किसी का हाथ देखकर यह बताइए कि उसकी किस्मत में अमीर बनना लिखा है या गरीब, मैं उसको उलटकर दिखा दूंगा |" राजा बोले |

"ठीक है, आप ही किसी व्यक्ति को बुलाइए, मैं बताता हूं उसका भविष्य और भाग्य |" ज्योतिषी ने शांतिपूर्वक उत्तर दिया |

राजा ने अपने मंत्री को चुपचाप कुछ आदेश दिया और कुछ ही क्षणों में एक सजा-धजा नौजवान ज्योतिषी के सामने हाजिर था | ज्योतिषी भद्रशील ने ध्यान से उस व्यक्ति का माथा देखा फिर हाथ देखकर कहा - "यह व्यक्ति गरीबी में जन्मा है और जिन्दगी भर गरीब ही रहेगा | इसे खेतों और पेड़ों के बीच कुटिया में रहने की आदत है और वहीं रहेगा |"

राजा चंदन सिंह सुनकर हैरत में पड़ गया, बोला - "आप ठीक कहते हैं, यह सजा-धजा नौजवान महल के राजसी वस्त्र पहनकर आया है, परंतु वास्तव में यह महल के बागों की देखभाल करने वाला गरीब माली है | परंतु गुरुदेव एक वर्ष के भीतर मैं इसे अमीर बना दूंगा | यह जिन्दगी भर गरीब नहीं रह सकता |"

राजा का घमंड देखकर ज्योतिषी ने कहा - "ठीक है, आप स्वयं आजमा लीजिए, मुझे आज्ञा दीजिए |" और ज्योतिषी भद्रशील चंदन नगर से चले गए |

राजा ने अगले दिन माली दयाल को बुलाकर एक पत्र दिया और साथ में यात्रा करने के लिए कुछ धन दिया | फिर उससे कहा - "यहां से सौ कोस दूर बालीपुर में मेरे परम मित्र भानुप्रताप रहते हैं, वहां जाओ और यह पत्र उन्हें दे आओ |"

सुनकर दयाल का चेहरा लटक गया | वह पत्र लेकर अपनी कुटिया में आ गया और सोचने लगा यहां तो पेड़ों की थोड़ी-बहुत देखभाल करके दिन भर आराम करता हूं | अब इतनी गर्मी में इतनी दूर जाना पड़ेगा |

परंतु राजा की आज्ञा थी, इसलिए अगले दिन सुबह तड़के वह चंदन नगर से पत्र लेकर निकल गया | दो गांव पार करते-करते वह बहुत थक चुका था और धूप चढ़ने लगी थी | इस कारण उसे भूख और प्यास भी जोर की लगी थी | वह उस गांव में बाजार से भोजन लेकर एक पेड़ के नीचे खाने बैठ गया | अभी आधा भोजन ही कर पाया था कि उसका एक अन्य मित्र, जो खेती ही करता था, मिल गया |

दयाल ने अपनी परेशानी अपने मित्र टीकम को बताई | सुनकर टीकम हंसने लगा, बोला - "इसमें परेशानी की क्या बात है ? राजा के काम से जाओगे, खूब आवभगत होगी | तुम्हारी जगह मैं होता तो खुशी-खुशी जाता |" यह सुनकर दयाल का चेहरा खुशी से खिल उठा, "तो ठीक है भैया  टीकम, तुम ही यह पत्र लेकर चले जाओ, मैं एक दिन यहीं आराम करके वापस चला जाऊंगा |"

टीकम ने खुशी-खुशी वह पत्र ले लिया और दो दिन में बाली नगर पहुंच गया | वहां का राजा भानुप्रताप था | टीकम आसानी से भानुप्रताप के दरवाजे तक पहुंच गया और सूचना भिजवाई कि चंदन नगर के राजा का दूत आया है | उसे तुरंत अंदर बुलाया गया |

टीकम की खूब आवभगत हुई | दरबार में मंत्रियों के साथ उसे बिठाया | गया जब उसने पत्र दिया तो भानुप्रताप ने पत्र खोला | पत्र में लिखा था - "प्रिय मित्र, यह बहुत योग्य एवं मेहनती व्यक्ति है | इसे अपने राज्य में इसकी इच्छानुसार चार सौ एकड़ जमीन दे दो और उसका मालिक बना दो | यह मेरे पुत्र समान है | यदि तुम चाहो तो इससे अपनी पुत्री का विवाह कर सकते हो | वापस आने पर मैं भी उसे अपने राज्य के पांच गांव इनाम में दे दूंगा |"

राजा भानुप्रताप को लगा कि यह सचमुच में योग्य व्यक्ति है, उसने अपनी पुत्री व पत्नी से सलाह करके पुत्री का विवाह टीकम से कर दिया और चलते समय ढेरों हीरे-जवाहारात देकर विदा किया |

उधर, आलसी दयाल थका-हारा अपनी कुटिया में पहुंचा और जाकर सो गया | दो दिन सोता रहा | फिर सुबह उठकर पेड़ों में पानी देने लगा | सुबह जब राजा अपने बाग में घूमने निकले तो दयाल से पत्र के बारे में पूछा | दयाल ने डरते-डरते सारी राजा को बता दी |

राजा को बहुत क्रोध आया और साथ ही ज्योतिषी की भविष्यवाणी भी याद आई | परंतु राजा ने सोचा कि कहीं भूल-चूक भी हो सकती है | अत: वह एक बार फिर प्रयत्न करके देखेगा कि दयाल को धनी किस प्रकार बनाया जाए ? तीन-चार दिन पश्चात् दयाल राजा का गुस्सा कम करने की इच्छा से खेत से बड़े-बड़े तरबूज तोड़कर लाया | और बोला - "सरकार, इस बार फसल बहुत अच्छी हुई है | देखिए, खेत में कितने बड़े-बड़े तरबूज हुए हैं | राजा खुश हो गया | उसने चुपचाप अपने मंत्री को इशारा कर दिया | मंत्री एक बड़ा तरबूज लेकर अंदर चला गया और उसे अंदर से खोखला कर उसमें हीरे-जवाहारात भरवाकर ज्यों का त्यों चिपकाकर ले आया |

राजा ने दयाल से कहा - "हम आज तुमसे बहुत खुश हुए हैं | तुम्हें इनाम में यह तरबूज देते हैं |"

सुनकर दयाल का चेहरा फिर लटक गया | वह सोचने लगा कि राजा ने इनाम दिया भी तो क्या ? वह बड़े उदास मन से तरबूज लेकर जा रहा था, तभी उसका परिचित लोटन मिल गया | वह बोला - "क्यों भाई, इतने उदास होकर तरबूज लिए कहां चले जा रहे हो ?"

दयाल बोला - "क्या करूं, बात ही कुछ ऐसी है | आज राजा मुझसे खुश हो गए, पर इनाम में दिया यह तरबूज | भला तरबूज भी इनाम में देने की चीज है ? मैं किसे खिलाऊंगा इतना बड़ा तरबूज ?"

लोटन बोला - "निराश क्यों होते हो भाई, इनाम तो इनाम ही है | मुझे ऐसा इनाम मिलता तो मेरे बच्चे खुश हो जाते |"

"फिर ठीक है, तुम्हीं ले लो यह तरबूज |" और दयाल तरबूज देकर कुटिया पर आ गया |

अगले दिन राजा ने दयाल का फिर वही फटा हाल देखा तो पूछा - "क्यों, तरबूज खाया नहीं ?"

दयाल ने सारी बात चुपचाप बता दी | राजा को दयाल पर बड़ा क्रोध आया ? पर कर क्या सकता था |

अगले दिन दयाल ने लोटन को बड़े अच्छे-अच्छे कपड़े पहने बग्घी में जाते देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा | दयाल ने अचानक धनी बनने का राज लोटन से पूछा तो उसने तरबूज का किस्सा बता दिया | सुनकर दयाल हाथ मलकर रह गया | तभी उसने देखा कि किसी राजा की बारात - सी आ रही है | उसने पास जाकर पता किया तो पता लगा कि कोई राजा अपनी दुल्हन को ब्याह कर ला रहा था | ज्यों ही उसने राजा का चेहरा देखा तो उसके हाथों के तोते उड़ गए | उसने देखा, राजसवारी पर टीकम बैठा था | अगले दिन टीकम से मिलने पर उसे पत्र की सच्चाई पता लगी, परंतु अब वह कर ही क्या सकता था ?

राजा ने भी किस्मत के आगे हार मान ली और सोचने लगा - 'ज्योतिषी ने सच ही कहा था, राजा भी गरीब को अमीर नहीं बना सकता, यदि उसकी किस्मत में गरीब रहना लिखा है |' अब राजा ने ज्योतिषी भद्रशील को बहुत ढ़ुंढ़वाया, पर उनका कहीं पता न लगा |