Monday, 27 March 2017

เคตिเคฆेเคถी เคฒोเค•เค•เคฅा : เคฌเฅœी เคฌाเคคें

                  रशिया की  लोककथा

                          बड़ी बातें

गांव में किसान के बेटे की शादी का मौका था | घर में खूब रौनक हो रही थी | स्त्रियां घर में खुशी के गीत गा रही थीं | बाहर चबूतरे पर घर के तथा गांव के अनेक लोग जमा थे |

खूब हंसी-मजाक का माहौल था | सब अपनी-अपनी बातें सुना रहे थे और हंस रहे थे | इस बीच गांव का एक दुकानदार शेखी बघारते हुए बोला - "जानते हो कल क्या हुआ ?" 

सब ने पूछा - "क्या हुआ ?"

"मेरी मुलाकात गांव के जमींदार ठाकुर से हुई | ठाकुर साहब ने मुझसे मेरे हाल-चाल पूछे |" दुकानदार बोला |

सारे लोग कहने लगे - "ऐसा तो हो ही नहीं सकता | ठाकुर एक नंबर का घमंडी और खूसट है | किसी से सीधे मुंह बात नहीं करता |

उन सबकी बातों को किसान का अठारह वर्षीय बेटा रोजर सुन रह था | वह बोला - "अरे चाचा, तुम तो मुलाकात की बात करते हो, मैं तो ठाकुर के साथ भोजन करके आ सकता हूं |"

सब लोग सुनकर हंसने लगे | फिर एक बुजुर्ग समझाने लगा - "बेटा सोच-समझकर अपनी हैसियत से बात करते हैं | ऊंचे-ऊंचे ख्वाब नहीं देखा करते | हमारी हैसियत कहां है कि हम ठाकुर के दर्शन भी कर सकें |"

रोजर हंसने लगा | वह बातों में सबसे आगे थे और बुद्धिमान भी था | अपना गुस्सा दबाते हुए बोला - "दादा जी, मैं कोई गप्प नहीं हांक रहा हूं, सच कह रहा हूं |"

दुकानदार रोजर की बात सुनकर मन ही मन खिसियाने लगा | अपना गुस्सा दबाते हुए बोला - "बेटा रोजर, तुमने अगर ठाकुर के घर भोजन करके दिखा दिया तो मैं तुम्हें बड़ा इनाम दूंगा | ज्यादा सपने नहीं देखा करते बच्चे |"

"अच्छा, क्या बड़ा इनाम दोगे ? अपने दोनों घोड़े मुझे दे दोगे ?" रोजर बोला |

"अरे दो घोड़े क्या, एक गाय भी दे दूंगा |" दुकानदार जोश में भरकर बोला, "लेकिन एक बात बताओ, अगर तुम एक दिन के अंदर ठाकुर के साथ भोजन नहीं कर सके तो तुम मुझे क्या दोगे ?"

"ठीक है, मैं तीन वर्ष तक तुम्हारी गुलामी करूंगा |" रोजर बोला |

सब लोग रोजर की तरफ देखने लगे | रोजर ने असंभव को संभव करने जैसी बात कही थी | 

अगले दिन सुबह रोजर ठाकुर के यहां पहुंचा तो द्वारपाल ने रोक लिया | रोजर ने उससे कहा - "ठाकुर साहब से पूछकर बताओ कि सोने की ईंटों के बारे में कुछ पूछना है | कहो तो कहीं और जाकर पूछ लूं |"

द्वारपाल ने ठाकुर को सारी बात बताई तो ठाकुर सुनकर मन ही मन जिज्ञासु हो उठा | परंतु ऊपर से शांत रहकर बोला - "लड़के को अंदर ले आओ, उसके साथ भोजन आदि का प्रबंध करो |"

रोजर को इज्जत के साथ भीतर ले जाया गया | वहां मेज पर भोजन और फल लगा दिए गए | थोड़ी देर में ठाकुर आकर रोजर के पास बैठ गया और पूछने लगा - "तुम्हारा क्या नाम है ? तुम्हारे पिता क्या काम करते हैं ?"

रोजर बोला - "मेरा नाम रोजर है | मेरे पिता किसान हें | मैं पूछ रहा था कि सोने की एक ईंट की कीमत क्या होगी ? उसके बदले में क्या-क्या खरीदा जा सकता है ?"

ठाकुर की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी | वह बोला - "सोने की ईंट की कीमत तो हजारों में होगी | तुम चाहो तो उसके बदले में जमीन-जानवर, बहुत कुछ मिल सकता है | वैसे तो ईंट के वजन पर निर्भर करता है कि ईंट की कीमत क्या है ? ईंट देख लूं तो पता चले | बोलो कितनी ईंटें हैं तुम्हारे पास ? एक या ज्यादा ? जाओ जल्दी से ले आओ | मैं अच्छे दाम दूंगा |" ठाकुर ईंट पाने की लालसा में लगातार बोलता जा रहा था और साथ ही अंगूर खाता जा रहा था |

रोजर चुपचाप बैठा भोजन खा रहा था | ठाकुर को लगा कि शायद रोजर को ईंटों की कीमत कुछ कम लग रही है अत: वह प्यार से बोला - "अरे बेटा, जो चाहोगे सो मिल जाएगा | जितनी जमीन चाहिए उतनी जमीन दे दूंगा, जाओ अपनी ईंटें ले आओ |"

रोजर बोला - "परंतु मेरे पास सोने की ईंटें हैं थोड़े ही, मैं तो यूं ही ईंटों का भाव पूछ रहा था | अगर कल मेरे पास ये ईंटें हों... |"

"भाग यहां से बदमाश, मुझे बेवकूफ बनाता है |" कहकर ठाकुर ने अपने सिपाहियों को जोर से आवाज लगाई |

"अरे आप तकलीफ क्यों करते हैं, मैं स्वयं ही चला जाता हूं |" रोजर बोला - "आप मुझे क्या जमीन-जानवर दोगे ? मुझे तो इस भोजन के बदले ही दो घोड़े और एक गाय मिलने वाली है |"

जमींदार ठाकुर हत्प्रभ होकर बातूनी रोजर को जाते हुए देख रहा था ।

Sunday, 26 March 2017

เคตिเคฆेเคถी เคฒोเค•เค•เคฅा : เคšเคฎ्เคฎเคš เค•ा เคธूเคช

           आइसलैंड की लोककथा

                 चम्मच का सूप

एक बार एक किसान किसी काम से शहर गया | जैसे ही शाम होने लगी, उसे लगा कि उसे तुरंत गांव लौट जाना चाहिए | अगर देर हो गई तो अंधेरे में घर पहुंचना मुश्किल हो जाएगा | वह अपना काम अधूरा छोड़कर गांव की ओर चल दिया |

वह थोड़ी ही दूर गया था कि अचानक बादल घिर आए, ठंडी हवाएं चलने लगीं | उसने अपनी चाल तेज कर दी | परंतु कुछ ही देर में बूंदा-बांदी होने लगी | किसान ने सोचा कि अगर मैं तेज चलूं तो शायद रात होने से पहले अपने घर पहुंच जाऊंगा | 

परंतु मौसम को यह मंजूर नहीं था | काली घटाओं के कारण जल्दी ही अंधेरा छाने लगा | बारिश भी तेज होने लगी | किसान ने आगे बढ़ना ठीक नहीं समझा | आगे जंगल का खतरनाक रास्ता था | एक तो खराब मौसम, ऊपर से जंगली रास्ता सोचकर किसान डर से मारे कांपने लगा |

वह एक छोटे-से घर के आगे बरामदे में दुबक कर बैठ गया | परंतु ठंडी हवाओं के कारण उसे सर्दी लगने लगी | रात होते-होते उसे सर्दी के साथ-साथ भूख भी लगने लगी | उसे कोई उपाय नहीं सूझ रहा था | वह सोचने लगा कि इस समय थोड़ा-सा कुछ गरम खाने को मिल जाता तो उसकी सर्दी भी मिट जाती और भूख भी कम हो जाती |

उसने डरते-डरते घर की कुंडी खटखटाई | अंदर से बुढ़िया ने दरवाजा खोला | बुढ़िया उस घर में अकेली रहती थी | उसने हिम्मत करके पूछा - "तुम कौन हो ? और इस तूफानी रात में मेरे दरवाजे पर क्या कर रहे हो ?"

किसान ने विनम्र होते हुए कहा - "मैं एक गरीब किसान हूं | मेरा नाम चोखे है | शहर में कुछ काम से आया था | अब बारिश के कारण यहां फंस गया हूं |"

बुढ़िया हट्टे-कट्टे जवान को देखकर भीतर से घबरा गई थी | परंतु ऊपर से हिम्मत दिखाते हुए बोली - "तो मुझसे क्या चाहते हो ?"

"मां जी, मुझे बहुत सर्दी लग रही है और साथ ही जोर की भूख लगी है | अगर आप मुझे अंदर आने देंगी और कुछ खिला देंगी तो मैं आपका एहसास जिन्दगी भर नहीं भूलूंगा |"

बुढ़िया ने उसे टालने की गरज से कहा - "चोखे, मेरे पास आज खाने को कुछ नहीं है, वरना तुम्हें कुछ न कुछ जरूर खिला देती |"

चोखे की दरवाजे के सामने ही रसोई में एक चम्मच दिखाई दिया | उसने कहा - "कोई बात नहीं मां जी, मैं चम्मच का सूप बना कर पी लूंगा | आपके घर में चम्मच तो है न ?"

रसोई में चम्मच सामने ही पड़ा था, अत: बुढ़िया कुछ बहाना न बना सकी | वह सोचने लगी मुझे तो चम्मच का सूप बनाना नहीं आता और भला चम्मच का सूप कैसे बनता है मैं भी तो देखूं | उसने किसान को भीतर आने दिया |

किसान ने चूल्हा जला दिया और सूप बनाने के लिए पतीला मांगा | फिर चम्मच को रगड़-रगड़ कर साफ किया | बुढ़िया चोखे को निहार कर देखे जा रही थी |

किसान ने बड़े पतीले में पानी भर कर उसमें चम्मच डाल दिया | पानी गरम होने लगा | इस बीच किसान ने कहा - "मां जी मेरा नाम तो चोखे है ही, मैं सूप भी बड़ा चोखा बनाता हूं |"

इतनी देर में पानी से भाप निकलने लगी | किसान बोला - "मां जी जरा-सा नमक होगा ?"

बुढ़िया नमक के लिए भला क्या मना करती, सो नमक का डिब्बा उठाकर किसान को दे दिया | किसान ने आधा चम्मच नमक उसमें डाल दिया और चलाने लगा |

कुछ ही मिनटों में पानी उबलने लगा | किसान ने उसे निकाल कर चखा | बुढ़िया देखकर हैरान हुई जा रही थी | इतने में किसान बोला - "सूप तो बड़ा स्वादिष्ट बन रहा है, लेकिन इसमें कोई सब्जी पड़ जाती तो मजा आ जाता |"

"कौन-सी सब्जी चाहिए, एक दो सब्जी तो मेरे पास भी हैं |" बुढ़िया बोली |

"टमाटर, लौकी, कद्दू, आलू कुछ भी चलेगा |" किसान ने कहा |

बुढ़िया ने सोचा, चलो आज नया सूप सीखने को मिल रहा है, तो उसने तीन-चार टमाटर किसान को दे दिए | किसान ने उन्हें चाकू से काट कर डाल दिया और चम्मच से दबा-दबा कर चलाने लगा |

किसान बोला - "आज तो वाकई बहुत स्वादिष्ट सूप बना लगता है | बहुत अच्छी खुशबू आ रही है | मैं अभी आपको चखाता हूं |"

बुढ़िया मन ही मन खुश होने लगी कि आज उसने चम्मच का सूप बनाना सीख लिया है | किसान ने थोड़ा-सा सूप चम्मच में निकाला फिर बुढ़िया से बोला - "मां, जी अगर आप इसे चखने के पहले चुटकी भर चीनी डाल लेंगी तो आपको अधिक स्वादिष्ट लगेगा |"

बुढ़िया ने चोखे का मतलब समझ लिया कि इसे सूप में डालने के लिए चम्मच भर चीनी चाहिए और किसान ने चीनी सूप में डाल दी | फिर किसान ने चम्मच से सूप को दो कटोरी में डाल दिया | वह बुढ़िया से बोला - "देखिए चम्मच का सूप कितना चोखा बना है |"

बुढ़िया ने सूप चखा तो दंग रह गई | बोली - "आज तक मैंने चम्मच का सूप न कभी सुना, न चखा, परंतु यह तो वास्तव में बहुत स्वादिष्ट है |"

बुढ़िया और किसान बैठकर गर्म सूप का आनंद लेने लगे | उनके पास से सर्दी कब की उड़नछू हो चुकी थी | 

Friday, 24 March 2017

เคตिเคฆेเคถी เคฒोเค•เค•เคฅा : เคœैเคธे เค•ो เคคैเคธा

Story Time ๐Ÿ˜Š

                          เคœैเคธे เค•ो เคคैเคธा

                     เค‡เคœिเคช्เคŸ เค•ी เคฒोเค•เค•เคฅा


เคจीเคฒ เคจเคฆी เค•े เคชाเคธ เคฌेเคธ เคเค• เค—ाँเคต เคฎें เคเค• เคเคกเคจ เคจाเคฎ เค•ा เคจौเคœเคตाเคจ เคฐเคนเคคा เคฅा। เค‰เคธเค•ा เค—เคฐीเคฌी เค•े เคฎाเคฐे เคฌुเคฐा เคนाเคฒ เคฅा । เค‰เคธเค•े เค˜เคฐ เคฎें เค•เคˆ-เค•เคˆ เคฆिเคจ เคคเค• เคญोเคœเคจ เคจเคธीเคฌ เคจเคนीं เคนो เคชाเคคा เคฅा । เค‰เคธเค•ी เคชเคค्เคจी เคซिเคฏोเคจा เค‰เคธे เคฐोเคœ เคธเคฎเคाเคคी เค•ि เคธเคฎเค เค”เคฐ เคฎेเคนเคจเคค เคธे เค•ाเคฎ เค•िเคฏा เค•เคฐो, เคชเคฐंเคคु เคเคกเคจ เคฌเคนुเคค เคธीเคงा, เคญोเคฒा-เคญाเคฒा, เคฎाเคธूเคฎ เคฅा । เค‡เคธी เค•ाเคฐเคฃ เคนเคฐ เคœเค—เคน เคงोเค–ा เค–ा เคœाเคคा เคฅा ।

เค•เคญी เคธीเคงेเคชเคจ เค•े เค•ाเคฐเคฃ เค‰เคธเคธे เคญूเคฒ เคนो เคœाเคคी เคคो เค•เคญी เค•ोเคˆ เค‰เคธे เคงोเค–ा เคฆे เคฆेเคคा, เคœिเคธเคธे เค‰เคธे เค…เคชเคจी เคฎเคœเคฆूเคฐी เคคเค• เคชूเคฐी เคจเคนीं เคฎिเคฒเคคी เคฅी ।


เคเค• เคฆिเคจ เคเคกเคจ เค•ी เคชเคค्เคจी เคจे เคธเคฎเคाเคฏा เค•ि เค•्เคฏों เคจ เคคुเคฎ เค…เคชเคจे เคฎिเคค्เคฐ เคฎाเคฐ्เค• เค•े เคชाเคธ เคœाเค•เคฐ เค•ोเคˆ เค•ाเคฎ เคฎाँเค—ो । เค•เคฎ เคธे เค•เคฎ เคตเคน เคงोเค–ा เคคो เคจ เคฆेเค—ा । เค‰เคธเค•े เคชाเคธ เคขेเคฐ เคธाเคฐी เคœเคฎीเคจ, เค˜ोเคก़े, เคฌैเคฒ เคนैं । เคตเคน เคคुเคฎ्เคนें เค–ेเคคों เค•ा เคฏा เคœाเคจเคตเคฐ เคฆेเค–เคจे เค•ा เค•ाเคฎ เค…เคตเคถ्เคฏ เคฆे เคฆेเค—ा । เคซिเคฐ เคนเคฎें เคนเคฐ เคฎเคนीเคจे เค—ुเคœाเคฐे เคฒाเคฏเค• เค•ुเค› เคจ เค•ुเค› เค…เคตเคถ्เคฏ เคฎिเคฒ เคœाเคเค—ा ।


เค…เคชเคจी เคชเคค्เคจी เค•ी เคธเคฒाเคน เคฎाเคจเค•เคฐ เคเคกเคจ, เคฎाเคฐ्เค• เค•े เคชाเคธ เคชเคนुँเคš เค—เคฏा । เคฎाเคฐ्เค• เคฌเคนुเคค เคšाเคฒाเค• เค”เคฐ เคธ्เคตाเคฐ्เคฅी เคฌเคจ เคšुเค•ा เคฅा । เคซिเคฐ เคญी เค…เคชเคจाเคชเคจ เคฆिเค–ाเคคे เคนुเค เคเคกเคจ เคธे เคฌोเคฒा - "เค ीเค• เคนै, เค…เคชเคจे เคเค• เค–ेเคค เค•ी เคœिเคฎ्เคฎेเคฆाเคฐी เคนเคฎ เคคुเคฎ्เคนें เคฆे เคฆेเคคे เคนैं । เค‡เคธ เคชเคฐ เคธाเคฐी เค–ेเคคी เคคुเคฎ เค•เคฐोเค—े । เคœो เคญी เคซเคธเคฒ เคนोเค—ी, เค†เคงी เคคुเคฎ्เคนाเคฐी เค†เคงी เคฎेเคฐी ।"


เคเคกเคจ เค–ुเคถ เคนो เค—เคฏा । เค…เคชเคจे เค˜เคฐ เคœाเค•เคฐ เค–ुเคถเค–เคฌเคฐी เค…เคชเคจी เคชเคค्เคจी เคซिเคฏोเคจा เค•ो เคธुเคจाเคˆ । เคชเคค्เคจी เค–ुเคถ เคนो เค—เคˆ เค”เคฐ เคธोเคšเคจे เคฒเค—ी - เค…เคฌ เคนเคฎाเคฐे เคฆिเคจ เคฌเคฆเคฒ เคœाเคँเค—े । เคนเคฎें เคชैเคธे เค•ी เค•เคฎी เคจเคนीं เคฐเคนेเค—ी ।


เค…เค—เคฒे เคฆिเคจ เคเคกเคจ, เคฎाเคฐ्เค• เค•े เคชाเคธ เค•ाเคฎ เค•े เคฒिเค เคชเคนुँเคš เค—เคฏा । เคฎाเคฐ्เค• เคจे เค…เคชเคจा เคเค• เค–ेเคค เคฆिเค–ाเคคे เคนुเค เค•เคนा เค•ि เค‡เคธी เค–ेเคค เคชเคฐ เคคुเคฎ्เคนें เคฎेเคนเคจเคค เคธे เค–ेเคคी เค•เคฐเคจी เคนै । เค–ाเคฆ, เคฌीเคœ เคธเคฌ เคฎैं เคฆूँเค—ा । เคคुเคฎ्เคนाเคฐे เค˜เคฐ เค–เคฐ्เคš เค•ो เค•ुเค› เคงเคจ เคญी เคฆे เคฆूँเค—ा เคชเคฐंเคคु เคœเคฌ เคซเคธเคฒ เคนोเคจे เคฒเค—ेเค—ी เคคो เค†เคงी เคฎेเคฐी เคนोเค—ी เค”เคฐ เค†เคงी เคคुเคฎ्เคนाเคฐी ।

เคเคกेเคจ เคฐाเคœी เคนो เค—เคฏा เคคो เคฎाเคฐ्เค• เคฌोเคฒा - "เคเคธे เค ीเค• เคจเคนीं เคฐเคนेเค—ा เคนเคฎ เคฒिเค–िเคค เคธौเคฆा เค•เคฐ เคฒेเคคे เคนैं । เคซเคธเคฒ เค•ा เคŠเคชเคฐी เคญाเค— เคคुเคฎ्เคนाเคฐा, เคœเคฎीเคจ เค•े เคจीเคšे เค•ा เคนिเคธ्เคธा เคฎेเคฐा ।"

เคเคกเคจ เคจे เค•เคนा - "เค ीเค• เคนै เคธौเคฆा เคคเคฏ เคฐเคนा ।"


เคเคกเคจ เคจे เค…เค—เคฒे เคฆिเคจ เคธे เคฎेเคนเคจเคค เคธे เค•ाเคฎ เค•เคฐเคจा เคถुเคฐू เค•เคฐ เคฆिเคฏा । เค‰เคธเคจे เคฎाเคฐ्เค• เค•े เคฆिเค เคนुเค เคฌीเคœ เคงเคฐเคคी เคฎें เคฌो เคฆिเค । เค•ुเค› เคนी เคฆिเคจ เคฎें เคชौเคงे เคจिเค•เคฒ เค†เค । เค–ेเคค เคนเคฐा เคญเคฐा เคนो เค‰เค ा । เค…เคฌ เคเคกเคจ เค–ूเคฌ เคฎेเคนเคจเคค เคธे เค•ाเคฎ เค•เคฐเคคा เค”เคฐ เคธोเคšเคคा เค•ि เคซเคธเคฒ เค•เคŸเคจे เคชเคฐ เค•्เคฏा-เค•्เคฏा เค–เคฐीเคฆूँเค—ा । เค†เค–िเคฐเค•ाเคฐ เคซเคธเคฒ เคคैเคฏाเคฐ เคนो เค—เคˆ । เคญोเคฒा เคเคกเคจ เค…เคชเคจे เคฎिเคค्เคฐ เค•ी เคšाเคฒाเค•ी เค…เคญी เคคเค• เคจเคนीं เคญाँเคช เคธเค•ा เคฅा ।


เคซเคธเคฒ เค•เคŸเคจे เค•े เคตเค•्เคค เคฎाเคฐ्เค• เคญी เค–ेเคค เคชเคฐ เค† เค—เคฏा । เคถเคฐ्เคค เค•े เคฎुเคคाเคฌिเค• เคซเคธเคฒ เค•ा เคŠเคชเคฐी เคญाเค— เคเคกเคจ เค•ो เคฎिเคฒเคจा เคฅा เคต เคœเคฎीเคจ เค•े เคจीเคšे เค•ा เคญाเค— เคฎाเคฐ्เค• เค•ो เคฎिเคฒเคจा เคฅा । เคฎाเคฐ्เค• เคจे เคšाเคฒाเค•ी เค•ी เคฅी เค”เคฐ เคถเคฒเค—เคฎ เค•ी เคซเคธเคฒ เคฌोเคˆ เคฅी । เคซเคธเคฒ เค•ाเคŸเค•เคฐ เค•เคฐ เคฆो เคฌैเคฒเค—ाเคก़िเคฏों เคฎें เคญเคฐ เคฆी เค—เคˆ ।

เคซाเคœเคฐी เคถเคฒเค—เคฎ เคฒेเค•เคฐ เคฌाเคœाเคฐ เคšเคฒा เค—เคฏा । เคตเคนाँ เค‰เคธเค•ी เคซเคธเคฒ เค–ूเคฌ เค…เคš्เค›े เคฆाเคฎों เคชเคฐ เคฌिเค•ी ।


เคเคกเคจ เคฌैเคฒเค—ाเคก़ी เคฎें เค…เคชเคจी เคซเคธเคฒ เคญเคฐ เค•เคฐ เคฌाเคœाเคฐ เคชเคนुँเคšा เคคो เคถเคฒเค—เคฎ เค•े เคชเคค्เคคों เค•ो เค–เคฐीเคฆเคจे เคตाเคฒा เค•ोเคˆ เคจ เคฅा । เคœाเคจเคตเคฐों เค•ा เคšाเคฐा เค–เคฐीเคฆเคจे เคตाเคฒों เคจे เคฅोเคก़े เคฌเคนुเคค เคชเคค्เคคे เค–เคฐीเคฆ เคฒिเค । เคถाเคฎ เคคเค• เคชเคค्เคคे เคธूเค–เคจे-เคธเคก़เคจे เคฒเค—े ।


เคฌेเคšाเคฐा เคเคกเคจ เคฆुเค–ी เคนोเคคे เคนुเค เค˜เคฐ เคชเคนुँเคšा । เคชเคค्เคจी เค•ो เคธाเคฐी เคฌाเคค เคตिเคธ्เคคाเคฐ เคธे เคธुเคจाเคˆ । เคตเคน เคฎाเคฐ्เค• เค•ी เคšाเคฒाเค•ी เคชเคฐ เคฎเคจ เคนी เคฎเคจ เค•्เคฐोเคงिเคค เคนो เคฐเคนी เคฅी เคชเคฐंเคคु เคตเคน เค•ुเค› เค•เคฐ เคจเคนीं เคธเค•เคคी เคฅी । เค†เค–िเคฐ เคเคกเคจ เค‡เคคเคจा เคธीเคงा เคฅा เค•ि เคธเคฎเคाเคจे เคธे เคฌाเคค เคจเคนीं เคฌเคจ เคธเค•เคคी เคฅी ।


เคฅोเคก़े เคฆिเคจ เคฌाเคฆ เคœเคฌ เคตเคน เคชुเคจ: เคฎाเคฐ्เค• เค•े เค–ेเคค เคชเคฐ เค•ाเคฎ เค•เคฐเคจे เคฒเค— เค—เคฏा เคคो เค‰เคธเคจे เคชुเคจ: เคฏเคนी เคถเคฐ्เคค เคฐเค–ी เค•ि เค†เคงी เคซเคธเคฒ เคคुเคฎ्เคนाเคฐी เค”เคฐ เค†เคงी เคฎเคฐी । เคเคกเคจ เคจे เค•เคนा เคฎुเคे เค‡เคธ เคฌाเคฐ เคจीเคšे เค•ी เคซเคธเคฒ เคšाเคนिเค । เคฎाเคฐ्เค• เคฎाเคจ เค—เคฏा ।


เคตเคน เคชเคนเคฒे เค•ी เคญाँเคคि เคฎाเคฐ्เค• เค•े เคฆिเค เคฌीเคœ เค–ेเคค เคชเคฐ เคฌो เค†เคฏा เค”เคฐ เค–ूเคฌ เคฎेเคนเคจเคค เคธे เค–ेเคคी เค•เคฐเคจे เคฒเค—ा । เคœเคฌ เคซเคธเคฒ เคชเค• เค•เคฐ เคคैเคฏाเคฐ เคนुเคˆ เคคो เค‰เคธे เคชเคคा เคฒเค—ा เค•ि เคฏเคน เคคो เค—ेเคนूँ เค•ी เคซเคธเคฒ เคนै । เคชเคฐंเคคु เคตเคน เค•ुเค› เคจเคนीं เค•เคฐ เคธเค•เคคा เคฅा । เคถเคฐ्เคค เค•े เค…เคจुเคธाเคฐ เคฎाเคฐ्เค• เคจे เคซเคธเคฒ เค•ा เคŠเคชเคฐी เคนिเคธ्เคธा เคฏाเคจी เค—ेเคนूँ เค•ी เคฌाเคฒिเคฏाँ เคฒे เคฒीं เค”เคฐ เค‰เคธเค•ी เคจीเคšे เค•ी เคถाเค–ाเคँ เคเคกเคจ เค•ो เคฆे เคฆीं । เคเคกเคจ เค•ो เค‡เคธ เคฌाเคฐ เคญी เคฌเคนुเคค เคจुเค•เคธाเคจ เค‰เค ाเคจा เคชเคก़ा ।

เคเคกเคจ เคจे เคธूเค–ी เคกाเคฒिเคฏों เค•ो เค•ुเคŸเคตा เค•เคฐ เคญूเคธा เคฌเคจเคตाเค•เคฐ เคฌाเคœाเคฐ เคฎें เคฌेเคš เคฆिเคฏा । เคชเคฐंเคคु เคฎाเคฐ्เค• เค—ेเคนूँ เคฌेเคšเค•เคฐ เคฎाเคฒाเคฎाเคฒ เคนो เค—เคฏा ।


เคฎाเคฐ्เค• เค•ी เคšเคคुเคฐाเคˆ เคธुเคจเค•เคฐ เคเคกเคจ เค•ी เคชเคค्เคจी เคซिเคฏोเคจा เคธे เคจ เคฐเคนा เค—เคฏा । เค‰เคธเคจे เคšाเคฒ เคšเคฒเคจे เค•ी เคธोเคšी เค”เคฐ เคฏोเคœเคจा เคฌเคจा เคกाเคฒी । เค‡เคธ เคฌाเคฐ เคเคกเคจ เค•े เคธाเคฅ เคซिเคฏोเคจा เคญी เคฎाเคฐ्เค• เค•े เคชाเคธ เค—เคˆ । เคตเคนाँ เคชเคนเคฒे เค•ी เคญाँเคคि เค–ेเคคी เคชเคฐ เค†เคงी-เค†เคงी เคซเคธเคฒ เค•ी เคฌाเคค เคคเคฏ เคนुเคˆ ।

เคเคกเคจ เคจे เค‡เคธ เคฌाเคฐ เคจीเคšे เค•ी เคซเคธเคฒ เคšुเคจी । เคชเคค्เคจी เคšाเคนเคคी เคฅी เค•ि เคถเคฐ्เคคें เค‰เคธी เค•े เคธเคฎाเคจे เคชเค•्เค•ी เคนों । เค…เคค: เคธाเคฐी เคถเคฐ्เคคें เคฒिเค–िเคค เคฎें เคชเค•्เค•ी เคนो เค—เคˆं ।


เค‡เคธเค•े เคฌाเคฆ เคเคกเคจ เค…เคชเคจी เคชเคค्เคจी เค•े เคธाเคฅ เคฎाเคฐ्เค• เค•े เค—ोเคฆाเคฎ เคธे เคฌीเคœ เคฒेเคจे เคชเคนुँเคšा । เคชเคค्เคจी เคจे เค‰เคจเค•े เคฆिเค เคฌीเคœ เค•ा เคฌोเคฐा เคฌเคฆเคฒ เค•เคฐ เคฆूเคธเคฐे เคฌीเคœ เค•ा เคฌोเคฐा เคฒे เคฆिเคฏा เค”เคฐ เค–ेเคค เคฎें เคœाเค•เคฐ เคฌो เคฆिเคฏा ।


เคนเคฎेเคถा เค•ी เคญांเคคि เคฎाเคฐ्เค• เค‡เคธ เคฌाเคฐ เคญी เค–ेเคคों เค•ी เค—ुเคก़ाเคˆ-เคฌुเค†เคˆ เคฆेเค–เคจे เคจเคนीं เค†เคฏा । เคเคกเคจ เคจे เค…เคชเคจी เคชเคค्เคจी เค•े เคธाเคฅ เคฎिเคฒเค•เคฐ เค–ेเคคी เค•เคฐเคจी เคถुเคฐू เค•เคฐ เคฆी । เคฆिเคจ-เคฐाเคค เคฎेเคนเคจเคค เค•เคฐเค•े เคฏे เคฆोเคจों เค–ेเคคों เคฎें เคฒเค—े เคฐเคนเคคे เค‰เคจเค•ी เคฎेเคนเคจเคค เคฐंเค— เคฒाเคˆ ।


เคซเคธเคฒ เคชเค•เคจे เคชเคฐ เคฎाเคฐ्เค• เคฌเคก़ी เค–ुเคถी เค”เคฐ เค˜เคฎंเคก เค•े เคธाเคฅ เค–ेเคค เคชเคฐ เค†เคฏा เคคो เคนเคฐी-เคญเคฐी เคฒเคนเคฒเคนाเคคी เคซเคธเคฒ เคฆेเค–เค•เคฐ เค–ुเคถी เคธे เคจाเคš เค‰เค ा । เคชเคฐंเคคु เคœเคฌ เคฎाเคฐ्เค• เค•े เคฎुंเคถी เคจे เค‰เคธเค•े เค•ाเคจ เคฎें เคซूँเค• เค•เคฐ เค•เคนा เค•ि เค‡เคธ เคฌाเคฐ เคคो เคเคกเคจ เค•ी เคจीเคšे เค•ी เคซเคธเคฒ เคนै, เคคो เคฎाเคฐ्เค• เค•े เคชैเคฐों เคคเคฒे เคธे เคœเคฎीเคจ เค–िเคธเค• เค—เคˆ ।


เคฎाเคฐ्เค• เคธเคฎเค เคจเคนीं เคชा เคฐเคนा เคฅा เค•ि เค‡เคธ เคฌाเคฐ เคงाเคจ เค•ी เคซเคธเคฒ เค•े เคฌเคฆเคฒे เค†เคฒू เค•ी เคซเคธเคฒ เค•ैเคธे เคฌเคจ เค—เคˆ । เคชเคฐเคจ्เคคु เคธเคฌเค•े เคธाเคฎเคจे เค•ुเค› เคจเคนीं เคฌोเคฒ เคธเค•ा । เคธाเคฎเคจे เคนी เคเคกเคจ เค•ी เคชเคค्เคจी เคญी เค–เคก़ी เคฎुเคธ्เค•เคฐा เคฐเคนी เคฅी ।


เคซिเคฐ เคซเคธเคฒ เค•ी เค•เคŸाเคˆ เคถुเคฐू เคนुเคˆ । เคถเคฐ्เคค เค•े เค…เคจुเคธाเคฐ เคซเคธเคฒ เคฆो เคœเค—เคน เคฒाเคฆी เคœाเคจे เคฒเค—ी । เค‡เคธ เคฌाเคฐ เคซเคธเคฒ เคœ्เคฏाเคฆा เคนुเคˆ เคฅी । เค‡เคธ เค•ाเคฐเคฃ เคฌैเคฒเค—ाเคก़ी เค•ी เคœเค—เคน เคซเคธเคฒ เค•ो เคŸ्เคฐเค• เคฎें เคฒाเคฆा เคœा เคฐเคนा เคฅा । เคเค• เคŸ्เคฐเค• เคฎें เค†เคฒू เคฒाเคฆे เคœा เคฐเคนे เคฅे เคคो เคฆूเคธเคฐी เคคเคฐเคซ เค‡เคธเค•े เคชौเคงे । เคเคกเคจ เค…เคชเคจी เค†เคฒू เค•ी เคซเคธเคฒ เคฒेเค•เคฐ เคฎंเคกी เคฎें เคชเคนुँเคšा เคคो เคฌเคนुเคค เค…เคš्เค›े เคฆाเคฎों เคชเคฐ เคซเคธเคฒ เคฌेเคš เคฆी ।


เคเคกเคจ เค•े เคธाเคฅ เค‰เคธเค•ी เคชเคค्เคจी เคญी เค—เคˆ เคฅी । เคฆोเคจों เคซเคธเคฒ เคฌेเคšเค•เคฐ เค–ुเคถी-เค–ुเคถी เค˜เคฐ เคฒौเคŸे । เค‰เคงเคฐ เคฎाเคฐ्เค• เค•े เค†เคฒू เค•े เคชौเคงे เคฎंเคกी เคชเคนुँเคšเคคे-เคชเคนुँเคšเคคे เคธूเค– เคšुเค•े เคฅे, เค…เคค: เค‰เคจ्เคนें เคœाเคจเคตเคฐों เค•े เคšाเคฐे เค•े เคฒिเค เคญी เค•ोเคˆ เค–เคฐीเคฆเคจे เคตाเคฒा เคจ เคฅा । เค‰เคธเค•ो เคชเคนเคฒी เคฌाเคฐ เคเคธा เคเคŸเค•ा เคฎिเคฒा เคฅा । เค‡เคธ เคฌाเคฐ เคœैเคธे เค•ो เคคैเคธा เคฎिเคฒा เคฅा ।


เค‰เคธเคจे เคฎเคจ เคนी เคฎเคจ เคจिเคถ्เคšเคฏ เค•िเคฏा เค•ि เค…เค—เคฒी เคซเคธเคฒ เคฎें เคตเคน เคฌเคฆเคฒा เคœเคฐूเคฐ เคจिเค•ाเคฒेเค—ा । เค‰เคธเคจे เค…เคชเคจे เคจौเค•เคฐ เค•े เคนाเคฅ เคเคกเคจ เค•े เคฏเคนाँ เค–เคฌเคฐ เคญिเคœเคตाเคˆ เค•ि เค…เค—เคฒी เคซเคธเคฒ เค•े เคฒिเค เคตเคน เคเคกเคจ เค•ा เค‡ंเคคเคœाเคฐ เค•เคฐ เคฐเคนा เคนै ।

เคเคกเคจ เค•ी เคชเคค्เคจी เคซिเคฏोเคจा เคจे เค•เคนเคฒा เคญेเคœा เค•ि เคนเคฎเคจे เค†เคงी เคซเคธเคฒ เค•ा เคธौเคฆा เค•เคฐเคจा เคฌंเคฆ เค•เคฐ เคฆिเคฏा เคนै ।

เค‡เคธ เคฌाเคฐ เคซเคธเคฒ เคฌेเคšเค•เคฐ เคฎिเคฒी เคฐเค•เคฎ เคธे เคเคกเคจ เค”เคฐ เคซिเคฏोเคจा เคจे เคฎिเคฒเค•เคฐ เค›ोเคŸा-เคธा เค–ेเคค เค–เคฐीเคฆा เค”เคฐ เค‰เคธ เคชเคฐ เคฎेเคนเคจเคค เค•เคฐเค•े เคธुเค– เคธे เคฐเคนเคจे เคฒเค—े ।

เค‰เคงเคฐ, เคฎाเคฐ्เค• เคจे เคธुเคจा เคคो เคชเค›เคคाเค•เคฐ เคนाเคฅ เคฎเคฒเคคा เคฐเคน เค—เคฏा ।

เคตिเคฆेเคถी เคฒोเค•เค•เคฅा : เค•เคฐाเคฎाเคคी เคฆाเคจा

                     फ्रेंच लोककथा

                    करामाती दाना

बहुत पहले की बात है | एक भिखारी सड़क के किनारे रहा करता था | उसका न तो कोई रहने का ठिकाना था और न ही कमाई का कोई निश्चित जरिया |

वह कंधे पर एक झोला लटकाए सुबह से शाम तक भीख मांगा करता था | कहीं से उसे रोटी मिल जाती तो दूसरी जगह से सब्जी मांग कर पेट भर लेता था | लोग उस वैगी कह कर पुकारते थे |

एक दिन वैगी को सुबह से शाम तक कुछ भी खाने को नहीं मिला | उसका भूख के मारे बुरा हाल था | वह परेशान होकर इधर-उधर घूम रहा था | तभी एक बूढ़ी स्त्री ने उसे अपने पास बुलाया और उसकी परेशानी का कारण पूछा |

स्त्री ने वैगी को एक गेहूं का दाना देते हुए कहा - "यह गेहूं का दाना करामाती है, इसे अपने पास संभाल कर रखना | जब तक यह दाना तुम्हारे पास रहेगा तुम्हें भोजन की कोई कमी नहीं होगी |"

वैगी दाने को उलट-पलट कर देखने लगा, फिर उसने सिर उठाकर स्त्री से कुछ पूछना चाहा, परंतु तब तक स्त्री गायब हो चुकी थी |

वैगी दाने को अपने थैले में डालकर भोजन की तलाश में पास के एक होटल की तरफ से गुजर रहा था | तभी एक व्यक्ति ने उसे रोककर कहा - "तुम यहां आकर पेट भर कर भोजन खा सकते हो | यहां आज हमारे सेठ जी का जन्मदिन मनाया जा रहा है |"

वैगी मन ही मन बहुत खुश हुआ और होटल से पेट भर खाना खाकर बाहर निकला | वह सोचने लगा कि यह गेहूं के दाने की करामात है या केवल एक संयोग कि उसे मुफ्त में पेट भर भोजन मिल गया |

अगले दिन वह घूमते-घूमते थक गया तो भोजन के लिए एक घर पर पहुंच गया | वहां उसने दरवाजे पर दस्तक दी | एक सभ्य व पढ़ी-लिखी स्त्री ने उसे आदरपूर्वक भीतर बुलाया और कहा - "आप यहां रात्रि को विश्राम कर सकते हैं | पहले आप भोजन कर लीजिए |"

वैगी को अब यकीन हो गया कि गेहूं का दाना वाकई करामाती है | उसने पेट भर भोजन किया और फिर सोने जाने लगा | तभी उसे शिष्टाचार की बात याद आई तो उसने अपने थैले से अपना चाकू व प्लेट निकालकर मेजबान स्त्री को दे दी | फिर उसने गेहूं का दाना स्त्री को देते हुए कहा - "मेडम, यह दाना मेरे लिए बहुत कीमती है, इसे संभाल कर रख लीजिए | सुबह को जाते वक्त यह दाना मैं आपसे वापस ले लूंगा |"

मेजबान स्त्री ने गेहूं का दाना संभाल कर मेज पर रखी प्लेट में रख दिया और सोने चली गई |

प्रतिदिन की भांति स्त्री सुबह को जल्दी उठ गई और अपनी मुर्गियों को बाड़े में दाना खिलाने लगी | फिर अपनी रसोई में काम करने चली गई |

तभी एक मुर्गी खुले दरवाजे से कमरे के भीतर आकर जमीन से बचा-खुचा खाना उठा कर खाने लगी | इसी बीच वैगी की आंख खुली | उसने देखा कि एक मुर्गी कमरे में घूम रही है |

वैगी मुर्गी के पीछे दौड़ा | मुर्गी बचने के लिए मेज पर चढ़ कर बैठ गई | उसने प्लेट में गेहूं का दाना देखा तो झट से खा गई | जब तक वैगी मुर्गी को पकड़ता, मुर्गी दाना खा चुकी थी |

वैगी ने शोर मचाना शुरू कर दिया | घर के सभी लोग जाग गए | घर का मालिक बहुत ही ईमानदार व शरीफ इंसान था | वह पूछने लगा - "आप हमारे मेहमान हैं, क्या बात हो गई, जिससे आप इतने नाराज हैं ?"

वैगी बोला - "मैंने मैडम को कह दिया था कि मेरा गेहूं का दाना संभाल कर रखिएगा, पर उन्होंने मेज पर रख दिया, उसे आपकी मुर्गी खा गई, मुझे वही गेहूं का दाना चाहिए |"

मेजबान लोग यह तो जानते नहीं थे कि उस दाने में क्या खासियत थी | वे खुशामद करने लगे कि आप जितने गेहूं चाहें ले जा सकते हैं | वह स्त्री एक कटोरी भर गेहूं ले आई, परंतु वैगी रोने लगा कि उसे वही दाना चाहिए | मेजबान ने कहा - "वह दाना तो मुर्गी के पेट में जा चुका है | आप चाहें तो उस मुर्गी को ले जा सकते हैं |"

वैगी को बात जंच गई | उसने वह मुर्गी लेकर अपने थैले में डाल ली और वहां से चल दिया | सारा दिन इधर-उधर घूमने के बाद वह शाम को एक घर के सामने पहुंचा | वहां भी उसको आदरपूर्वक भीतर बुलाया गया और स्वादिष्ट पकवान खिलाए गए |

वैगी ने मकान की मालिकिन को मुर्गी और थैला संभाल कर रखने को दे दिया और सो गया | सुबह उठ कर वैगी ने मालिकिन से अपनी मुर्गी मांगी | मालिकिन मुर्गी लेने गई तो देखा कि वैगी की मुर्गी के पंख बिखरे पड़े हैं |

मालिकिन के नौकर ने बताया कि नई मुर्गी देखकर मालिकिन की मुर्गियों ने बाड़े में उस पर आक्रमण कर दिया और अपनी चोंचें मार-मार कर लहूलुहान कर दिया था | इससे वैगी की मुर्गी जान बचाने के लिए बाहर भागी थी | बरामदे में ही मालिकिन का कुत्ता बैठा था जो मुर्गी को मार कर खा गया | वैगी रोने-चिल्लाने लगा कि उसे अपनी वही मुर्गी चाहिए |

मालिकिन की समझ में नहीं आ रहा था कि वैगी को कैसे शांत कराए | उसने विनती करते हुए कहा कि आप उसके बदले में कोई-सी मुर्गी ले सकते हैं परंतु वैगी नहीं माना | तब मालिकिन ने हार कर अपना पालतू कुत्ता वैगी को दे दिया |

वैगी ने उस कुत्ते को अपने थैले में डाल लिया और आगे चल दिया | आगे जाकर वह एक शानदार बंगले के आगे रुका | बंगले में राजकुमारी अपने परिवार के साथ रहती थी | बंगले की मालिकिन ने वैगी को भीतर बुलाया | नहला-धुला कर कपड़े दिए, फिर पेट भर भोजन खाने को दिया |

बंगले में रहने वाली राजकुमारी को देखकर वैगी के दिल में लालच आ गया | वह सोचने लगा कि एक गेहूं के दाने की करामात के कारण उसे मुर्गी और फिर मालिकिन का प्यारा कुत्ता मिल गया | यदि किसी तरह यह कुत्ता मर जाए तो बदले में मैं राजकुमारी को मांग लूं और उससे विवाह कर लूं, फिर मेरा जीवन सुखमय हो जाएगा |

वैगी ने जानबूझकर कुत्ते को राजकुमारी के पीछे लगा दिया | जब राजकुमारी अपनी सखियों के साथ बगीचे में खेल रही थी, तभी कुत्ता जोर से राजकुमारी पर झपट पड़ा | राजकुमारी ने अपने बचाव में एक बड़ा पत्थर कुत्ते को दे मारा | कुत्ते को चोट लगी, पर कुत्ता फिर उठकर राजकुमारी के पीछे भागा | इस बार राजकुमारी ने क्रोध में आकर कुत्ते पर डंडे से वार कर दिया | कुत्ता वहीं मर कर ढेर हो गया |

वैगी जब बंगले से बाहर जाने लगा तो उसने बंगले की मालिकिन से अपना कुत्ता मांगा | परंतु मालिकिन ने सकुचाते हुए कुत्ते के मरने का सारा किस्सा बयान कर दिया |

वैगी जोर-जोर से रोने-चिल्लाने लगा कि उसे अपना ही कुत्ता चाहिए | बगंले की मालिकिन ने बहुत समझाया कि वह दूसरा कुत्ते ले लो, परंतु वह नहीं माना | तब बंगले की मालिकिन ने असमर्थता प्रकट कर दी | वैगी बोला - "जिसने मेरे कुत्ते को मारा है, मुझे वही दे दीजिए, मैं उसी से संतुष्ट हो जाऊंगा |"

मालिकिन को वैगी की बात सुनकर बहुत क्रोध आया कि एक आदमी कुत्ते के बदले उनकी बेटी मांग रहा था |

मालिकिन ने कहा - "तुम्हें मैं एक हजार मोहरें देती हूं | यदि तुममें कोई हुनर है या किसी कला में निपुण हो तो इन्हें एक महीने में अपनी कमाई से दोगुना कर लाओ | यदि तुम यह कर सके तो अपनी बेटी का हाथ तुम्हें दे दूंगी |"

वैगी को धन का लालच आ गया और मोहरें लेने को तैयार हो गया | उसने मोहरें लेकर अपने थैले में डाल लीं और चल दिया |

रास्ते में वैगी ऊंचे-ऊंचे सपने देखने लगा | परंतु वह यह नहीं समझ पा रहा था कि वह किस तरह का व्यापार करके इन मोहरों को दुगुना करे | वैगी को भीख मांगने के सिवा कुछ काम नहीं आता था | भीख मांग कर एक महीने में तो क्या एक वर्ष में भी इतनी मोहरें कमाना संभव नहीं होगा |

तभी वैगी ने सोचा कि वह पहले कुछ मोहरें खर्च करके आराम से जीवन बिताएगा | फिर बाद में कमाई के बारे में सोचेगा |

रास्ते में एक जगह रुक कर वैगी ने मोहर निकालने के लिए थैले में हाथ डाला तो उसे यूं लगा कि हाथ में कुछ चुभ गया हो | उसने तुरंत हाथ बाहर निकाल लिया | उसने थैला खोल कर देखना चाहा तो सैकड़ों कीड़े-मकौड़े उड़कर उसे काटने लगे |

वैगी ने थैला उठा कर दूर नदी में फेंक दिया | वैगी खाली हाथ रह गया | अब उसके सामने भीख मांगने के सिवा कोई चारा नहीं था | उसे लालच का फल मिल गया था | 

Wednesday, 22 March 2017

เคตिเคฆेเคถी เคฒोเค•เค•เคฅा : เคˆเคฐ्เคท्เคฏा

           बुल्गेरिया की लोककथा
 
                       ईर्ष्या

बहुत पहले की बात है | एक गरीब किसान एक गांव में रहता था | उसके पास एक बहुत छोटा सा खेत था जिसमें कुछ सब्जियां उगा कर वह अपना व अपने परिवार का पेट पालता था |

गरीबी के कारण उसके पास धन की हमेशा कमी रहती थी | वह बहुत ईर्ष्यालु स्वभाव का था | इस कारण उसकी अपने अड़ोसी-पड़ोसी व रिश्तेदारों से बिल्कुल नहीं निभती थी | 
किसान की उम्र ढलने लगी थी, अत: उसे खेत पर काम करने में काफी मुश्किल आती थी | खेत जोतने के लिए उसके पास बैल नहीं थे | सिंचाई के लिए वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता था | खेत में या आस-पास कोई कुआं भी नहीं था, जिससे वह अपने खेतों की सिंचाई कर सके |

एक दिन वह अपने खेत से थका-हारा लौट रहा था | उसे रास्ते में सफेद कपड़ों में सफेद दाढ़ी वाला एक बूढ़ा मिला | बूढ़ा बोला - "क्या बात है भाई, बहुत दुखी जान पड़ते हो ?"

किसान बोला - "क्या बताऊं बाबा, मेरे पास धन की बहुत कमी है | मेरे पास एक बैल होता तो मैं खेत की जुताई, बुआई और सिंचाई का सारा काम आराम से कर लेता |"

बूढ़ा बोला - "अगर तुम्हें एक बैल मिल जाए तो तुम क्या करोगे ?"

"तब मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहेगा | मेरी खेती का सारा काम बहुत आसान हो जाएगा पर बैल मुझे मिलेगा कहां से ?" किसान बोला |

"मैं आज ही तुम्हें एक बैल दिए देता हूं, यह बैल घर ले जाओ और घर जाकर अपने पड़ोसी को मेरे पास भेज देना |" बूढ़े ने कहा |

किसान बोला - "आप मुझे बैल दे देंगे, यह जानकर मुझे बहुत खुशी हुई | परंतु आप मेरे पड़ोसी से क्यों मिलना चाहते हैं ?"

बूढ़ा बोला - "अपने पड़ोसी से कहना कि वह मेरे पास आकर दो बैल ले जाए |"

बूढ़े की बात सुनकर किसान को भीतर ही भीतर क्रोध आने लगा | वह ईर्ष्या के कारण जल-भुन कर रह गया | वह बोला - "आप नहीं जानते कि मेरे पड़ोसी के पास सब कुछ है | यदि आप मेरे पड़ोसी को दो बैल देना चाहते हैं तो मुझे एक बैल भी नहीं चाहिए |"

बूढ़े ने बैल को अपनी ओर खींच लिया और कहा - "क्या तुम जानते हो कि तुम्हारी समस्या क्या है ? तुम्हारी समस्या गरीबी नहीं ईर्ष्या है | तुम्हें जो कुछ मिल रहा है, यदि तुम उसी को देखकर संतुष्ट हो जाते और पड़ोसियों व रिश्तेदारों की सुख-सुविधा से ईर्ष्या ने करते तो शायद संसार में सबसे ज्यादा सुखी इंसान बन जाते |"

इतना कहकर बूढ़ा जंगल में ओझल हो गया | किसान मनुष्य की ईर्ष्यालु प्रवृत्ति के बारे में सोचने लगा | 

เคตिเคฆेเคถी เคฒोเค•เค•เคฅा : เคนोเคถिเคฏाเคฐ เคฒเฅœเค•ा



            कोरिया की लोककथा

               होशियार लड़का

एक चरवाहे का बेटा चीमो हर रोज अपनी भेड़ें चराने के लिए मैदान में जाया करता था | वह रोज सुबह भेड़ों को लेकर हरे-भरे मैदानों की ओर चल पड़ता था | सूरज डूबने से पहले ही वह घर को वापस चल देता था |

एक दिन वह मैदान में बैठा कुछ सोच रहा था कि अचानक जोर से उछल पड़ा | उसने अपनी फर की टोपी जोर से हवा में उछाल दी | 

टोपी हवा में उछल कर उधर से गुजर रहे घोड़े के मुंह पर जा गिरी | अचानक टोपी गिरने से घोड़ा बिदक गया और अपनी पिछली टांगों पर खड़ा हो गया | घोड़े के अगले पैर ऊपर उठ जाने से घुड़सवार खेत में जा गिरा |

इस घोड़े पर सवार युवक शहर के बड़े व्यापारी का बेटा था | वह सज-धज कर पिता के काम से कहीं जा रहा था |

युवक को बहुत जोर का क्रोध आ गया | वह कपड़े झाड़कर खड़ा हो गया और चिल्लाकर चरवाहे के लड़के से बोला - "ऐ लड़के, तुम्हें जरा भी अक्ल नहीं | तुमने मेरे घोड़े को डरा दिया और मुझे गिरा दिया |"

चीमो बोला - "मैंने तो खुशी में टोपी उछाली थी मुझे क्या पता था कि यह घोड़े के पास गिरेगी और घोड़ा डर जाएगा |"

"ऐसी क्या खुशी मिल गई तुम्हें | जरा हमें भी तो बताओ और अगर मुझे चोट लग जाती तो तुम्हारी खैर नहीं थी |" युवक बोला |

चीमो बोला - "मेरे पिता ने मुझसे एक सवाल पूछा था मैंने उसका उत्तर ढूंढ़ लिया है |"

"ऐसा क्या सवाल था ?" 

"सवाल यह था कि वह चीज है जो आदमी से ऊंची है, लेकिन मुर्गी से छोटी |"

"भला ऐसी क्या चीज हो सकती है ?"

"तो क्या इसका उत्तर आपको भी नहीं मालूम |"

"मालूम तो है पर तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं |" युवक ने चतुराई से कहा |

चीमो बोला - "वह चीज टोपी है | यह मनुष्य के सिर पर रहकर मनुष्य से ऊंची रहती है, परंतु जमीन पर रख दो तो मुर्गी से भी छोटी बन जाती है |"

युवक चीमो की बात सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ | वह बोला - "काफी होशियार जान पड़ते हो | यदि तुमने मेरा एक काम कर दिया तो में तुम्हें ढेर-सा इनाम दूंगा | कल मैं लौटते वक्त तुम्हारे पास आऊंगा | तुम मेरे लिए एक ऐसी भेड़ का इंतजाम करके रखना, जो न काली हो, न भूरी हो, न सफेद हो और न ही चितकबरी हो |"

यह कहकर वह युवक वहां से चला गया | चीमो उसके जाने के बाद सोचता रहा |

अगले दिन चीमो अपनी भेड़ चरा रहा था | तभी फल वाला युवक अपने घोड़े पर सवार आया और बोला - "लड़के क्या तुमने मेरे लिए मेरी मनपसन्द भेड़ लाकर रखी है |"

चीमो बोला - "आपकी मनपसन्द भेड़ मेरे घर पर है | आप उसे किसी को भेज कर मंगवा सकते हैं | परंतु ध्यान रखिएगा कि जो व्यक्ति लेने आए वह न रविवार को आए, न सोमवार या मंगल को न बुद्ध या बृहस्पति को, न शुक्र या शनिवार को दिन में आए न रात्रि में |"

चीमो की बात सुनकर युवक जोर से हंसा और बोला - "मैं तुम्हारी बुद्धिमत्ता से खुश हुआ | यह सोने की पांच अशर्फियां तुम्हारा इनाम है | यदि तुम कभी कोई नौकरी करना चाहो तो मेरे पास चले आना |"

यह कर कर युवक ने अपना पता चीमो को दे दिया और घोड़े पर सवार होकर घोड़ा दौड़ाता हुआ चला गया |