Friday, 20 January 2017

Story Time : เคชाเคจी เค•ी เค•เคฎाเคˆ เคชाเคจी เคฎें

                    पानी की कमाई पानी में

                            बहुत समय पहले की बात है, एक जंगल के किनारे कुछ ग्वाले रहते थे| वे अपने गाय  भैसों का दूध बेचने के लिए शहर में जाया करते थे| उन ग्वालों में एक ग्वाला बहुत लालची था| वह रोज दूध बेचने जाते समय रास्ते में पड़ती नदी में से दूध में पानी मिला दिया करता था|

                             एक दिन जब ग्वाले बाज़ार से अपनी बिक्री का हिसाब  करके पैसे ले कर घर को आ रहे थे तो दोपहर की गर्मी से तंग आकर उन्हों ने नदी में नहाने का मन बनाया| सभी ग्वालो ने अपने अपने कपडे उतार कर एक पेड़ के नीचे रख दिए और नहाने के लिए नदी के बीच में चले गए| कुछ ही देर में पेड़ से एक बन्दर उतरा और उस लालची ग्वाले के कपड़े उठाकर पेड़ पर ले गया | उसने उसकी जेब से रुपये के सिक्कों वाली थैली निकाली और एक एक करके नदी में फैंकने  लग गया| ग्वाला चिल्लाया और अपने कपडे और पैसे छुड़ाने के लिए बन्दर के पीछे भागा| इतनी देर में वह बन्दर  बहुत सारे सिक्के नदी में गिरा चुका था|

                              लालची ग्वाला अपने भाग्य को कोसने लगा और  कहने लगा कि देखो मेरी महीने की कमाई के आधे पैसे बन्दर ने पानी में मिला दिए| इसपर उसके साथी ग्वालों ने कहा तुमने जितने पैसे पानी मिलाकर कमाए थे उतने पैसे पानी में ही चले गए हैं| पानी की कमाई  पानी में| उस दिन से उस ग्वाले ने दूध में पानी मिलाना छोड़ दिया और ईमानदारी से दूध बेचने लगा| इसी लिए कहते हैं कि पाप की कमाई कभी फलती नहीं है| 

เคชंเคšเคคंเคค्เคฐ : เคเค• เคธे เคญเคฒे เคฆो


    
                            पंचतंत्र

                        एक से भले दो

            किसी गांव में एक ब्राहमण  रहता था| एक बार किसी कार्यवश ब्राहमण  को  किसी दूसरे गांव जाना था| उसकी माँ ने उस से कहा कि किसी को साथ लेले क्यूँ कि रास्ता जंगल का था| ब्राहमण ने कहा माँ! तुम डरो मत,मैं अकेला ही चला जाऊंगा क्यों  कि कोई साथी मिला नहीं है| माँ ने उसका यह निश्चय जानकर कि वह अकेले ही जा रहा है पास की एक नदी  से माँ एक केकड़ा पकड कर ले आई और बेटे को देते हुए बोली कि बेटा अगर तुम्हारा वहां जाना आवश्यक है तो इस केकड़े को ही साथ के लिए लेलो|  एक से भले दो| यह तुम्हारा सहायक सिध्द होगा| पहले तो ब्राहमण को केकड़ा साथ लेजाना अच्छा नहीं लगा, वह सोचने लगा कि केकड़ा मेरी क्या सहायता कर सकता है| फिर माँ की बात को आज्ञांरूप मान कर उसने पास पड़ी एक डिब्बी में केकड़े को रख लिया| यह डब्बी कपूर की थी| उसने इस को अपने झोले में डाल लिया और अपनी यात्रा के लिए चल पड़ा|

                   कुछ दूर जाने के बाद धूप काफी तेज हो गई| गर्मी और धूप से परेशान होकर वह एक पेड़ के नीचे आराम करने लगा| पेड़ की ठंडी छाया में उसे जल्दी ही नींद  भी आगई| उस पेड़ के कोटर  में एक सांप भी रहता था| ब्राहमण  को सोता देख कर वह उसे डसने के लिए कोटर से बाहर निकला| जब वह ब्राहमण  के करीब आया तो उसे कपूर की सुगंध आने लगी| वह ब्राहमण  के बजाय झोले में रखे केकड़े वाली डिब्बी की तरफ हो लिया|उसने जब डब्बी को खाने के लिए झपटा मारा तो डब्बी टूट गई जिस से केकड़ा बाहर आ गया और डिब्बी सांप के दांतों में अटक गई केकड़े ने मौका पाकर सांप  को गर्दन से पकड़ कर अपने तेज नाखूनों से कस लिया|सांप वहीँ पर ढेर  हो गया| उधर नींद खुलने पर ब्राहमण  ने देखा की पास में ही एक सांप मारा पड़ा है| उसके दांतों में डिबिया देख कर वह समझ गया कि इसे केकड़े ने ही मारा है| वह सोचने  लगा कि माँ की आज्ञां मान लेने के कारण आज मेरे प्राणों की रक्षा हो गई, नहीं तो यह सांप मुझे जिन्दा नहीं छोड़ता| इस लिए हमें अपने बड़े, माता ,पिता और गुरु जनों की आज्ञां का पालन जरुर करना चाहिए|                            

เคฒोเค• เค•เคฅा : เคšिเฅœी เค•े เคšिเคจुเค†

               भारत की लोककथाएँ

                 " चिड़ी के चिनुआ "

  एक समय की बात है के एक ज़ालिम कौवे की एक चिड़िया के साथ दोस्ती हो गई। एक दिन दोनों दाना चुगने के लिए इक्कठे घर से निकले। काफ़ी मेहनत करने के बाद उन्हें कुछ भी खाने को नहीं मिला। बुरी नियत वाला कौवा बहुत भूखा था। उसका दिल कर रहा था के वो इस चिड़िया के मुलायम मुलायम चिनुआ को खा जाए। जिससे उसकी भूख मिट जाएगी और उसे दाना चुगने के लिए इधर – उधर भी नहीं भटकना पड़ेगा। पर वो दोस्ती के नाम पर कलंक नहीं लगाना चाहता था।

कौवे के मन में बहुत सारी योजनाएं आ रही थी के किस तरह वो इस चिड़िया के चिनुआ को खा जाए।

अचानक कौवे ने देखा के एक घर की छत पर कुछ हरी मिर्चें सूखने के लिए पड़ी हैं। दोनों ने सोचा के अगर आज इन मिर्चों को खाकर ही अपनी भूख मिटा ली जाए।

पर उस कौवे के नजर तो पहले से ही बिगड़ी हुई थी। उसने चिड़िया से कहा क्यों ना आज मिर्च खाने का मुकाबला हो जाए। चिड़िया ने कौवे से कहा में आपका मुकाबला नहीं कर सकती हूं और कौवे ने फिर चालाकी से कहा अच्छा चलो तुम मेरे से आधी मिर्च खा लेना। चिड़ी मान गई।

कौवा अपनी गंदी योजना के मुताबिक बोला जो जीता दूसरा उसका गुलाम हो जाएगा और जीतने वाला जो भी चाहे वो गुलाम को मानना पड़ेगा।

उस भोली चिड़िया ने कौवे की बात को मान लिया। इस तरह कौवे ने चालाकी से चिड़िया को हरा दिया। कौवा बोला तुम मुझसे हार गई और अब तुम मेरी गुलाम हो। अब तुम्हे मेरा हुक्म मानना होगा। मुझे बहुत सख्त भूख लगी है इसीलिए में तुम्हारे चिनुआ खाकर आपनी भूख मिटाऊंगा।

आगे से चिड़ी भी कौवे की चालाकी समझ चुकी थी। चिड़ी बोली तुम्हारी बात मानने में मुझे कोई एतराज़ नहीं है। तुम मेरे चिनुआ खा लेना पर इससे पहले तुम्हे अपनी चोंच को धोना पड़ेगा। यह बहुत गंदी हो चुकी है। कौवा यह सुनकर बहुत खुश हुआ और उसने चिड़िया की बात को मान लिया।

जब कौवा नजदीक की नदी में अपनी चोंच को धोने गया और नदी से बोला  -

"नदी नदी तुम दो पनीला, धोऐं चोंच, खाएँ चिया के चिनुआ,  मटकाएँ चोंच☺️"

तो नदी सोच में पड़ गई और उस ने कहा तुम अपनी चोंच तभी धो सकते हो अगर तुम कहीं से कटोरा लेकर आओ में तुझे अपना पानी गंदा नहीं करने दुंगी। कौवा कटोरा लेने के लिए कुम्हार के पास गया और बोला -

"कुम्हार कुम्हार तुम दो कटोरा, भरें पनीला, धोऐं चोंच, खाएँ चिया के चिनुआ,  मटकाएँ चोंच☺️"

उसने भी उसको कटोरा देने से मना कर दिया। कुम्हार ने कौवे से कहा के उसे कटोरा एक ही शर्त पर मिलेगा अगर वो उसके लिए मिट्टी खोदकर लेकर आएगा। जब कौवा धरती से मिट्टी लेने गया और बोला-

"माटी माटी तुम दो मटीला, बने कटोरा, भरें पनीला, धोऐं चोंच, खाएँ चिया के चिनुआ,  मटकाएँ चोंच☺️"

मिट्टी भी समझ गई उसने कहा एक ही शर्त पर मिट्टी मिलेगी अगर वो मिट्टी खोदने के लिए कहीं से रम्बा लेकर आयेगा। वो उसकी गंदी चोंच से मिट्टी नहीं खोदने देगी।

इस तरह कौवा रम्बा लेने के लिए लुहार के पास गया और बोला-

  "लुहार लुहार तुम दो रम्बा, खोदे मटीला, बने कटोरा, भरें पनीला, धोऐं चोंच, खाएँ चिया के चिनुआ,  मटकाएँ चोंच☺️"

   लुहार कौवा की नालायकी जान गया उस ने भी कौवे से एक शर्त रखी के अगर वो भठ्ठी को जलाने के लिए कहीं से आग लेकर आए। आग लेने के लिए कौवा एक घर में गया उसने उस घर की औरत से आग के लिए बिनती की। और बोला-

"अम्मा अम्मा तुम दो आगी, मिले रम्बा, खोदे मटीला, बने कटोरा, भरें पनीला, धोऐं चोंच, खाएँ चिया के चिनुआ,  मटकाएँ चोंच☺️"

वो औरत बहुत नेकदिल थी। वो कौवे से बोली के आग तो तुम्हे मिल जाएगी पर तुम आग किस तरह लेकर जाएगा।
कौवा ने अपने घमंड में कहा के तुम आग को मेरी पीठ पर बांध दो। में इसे जल्दी से जल्दी लेकर चला जाउंगा। उस औरत ने आग का एक गोला उस कौवे की पीठ पर बांध दिया और कौवा आग लेकर उड़ने लगा। थोड़ी दूर उड़ने के बाद कौवे के पंखों को आग लग गई और वो घिसटता हुआ चिड़ी के पास जाकर गिरा और वहीँ उसकी मौत हो गई।

शिक्षा  – बुरी नियत वालों के साथ हमेशा बुरा ही होता है ।

เคชंเคšเคคंเคค्เคฐ : เคฆो เคฌเค•เคฐे

                           पंचतंत्र

                          दो बकरे

दो बकरे थे। एक काले रंग का था एक भूरे रंग का था। एक दिन वे झरने पर बने पुल से गुजर रहे थे। काला बकरा पुल के इस छोर से और भूरा बकरा उस छोर से आ रहा था। पुल के बीचो-बीच दोनों बकरो का आमना-सामना हुआ। दोनों अकड़कर खड़े हो गए। पुल बहुत ही सँकरा था। एक बार में उस पुल पर से एक ही जानवर पुल से जा सकता था। 
काले बकरे ने भूरे बकरे से गुर्रा कर कहा, "तू मेरे रास्ते से हट जा।" भूरे बकरे ने भी इसी प्रकार गुर्रा कर जवाब दिया, "अबे कालिए, वापस चला जा, वरना मैं तुझे इस झरने में फेंक दूँगा।" 
वे दोनो थोडी देर तक एक-दूसरे को धमकाते रहे। उसके बाद दोनों एक दूसरे से भिड़ गए। फिर क्या था! दोनों अपना-अपना संतुलन खो बैठे और लड़खड़ाकर झरने मे जा गिरे। वे झरने की धारा के साथ बहने लगे। थोड़ी देर में ही दोनों डूब कर मर गए।
इसी तरह दूसरी बार दो बकरियाँ इसी पुल के बीचोबीच आमने-सामने आ गईं। वे दोनो समझदार एंव शांत मिजाज वाली थीं। उनमें से एक बकरी बैठ गई। उसने दूसरी बकरी को अपने शरीर के ऊपर से जाने दिया। उसके बाद वह खड़ी हो गई। धीरे- धीरे चल कर उसने भी पुल पार कर लिया।

शिक्षा -क्रोध दुख का मूल है, शांति खुशी की खान है

เคชंเคšเคคंเคค्เคฐ : เคจเค•เคฒเคšी เคฌเคจ्เคฆเคฐ


                              เคชंเคšเคคंเคค्เคฐ

                         เคจเค•เคฒเคšी เคฌเคจ्เคฆเคฐ

เคเค• เคŸोเคชी เคตिเค•्เคฐेเคคा เคฅा । เคตเคน เค—ाเคตँ เคถเคนเคฐ เค˜ूเคฎ เค˜ूเคฎ เค•เคฐ เคŸोเคชी เคฌेเคšा เค•เคฐเคคा เคฅा । เคเค• เคฆिเคจ เคตเคน เค…เคชเคจे เคต्เคฏाเคชเคฐ เค•े เคฒिเค เคเค• เค—ाเคตँ เคฎें เค˜ूเคฎเค•เคฐ เค–ूเคฌ เคซेเคฐी เคฒเค—ाเคฏा । เคธुเคฌเคน เคธे เคฆोเคชเคนเคฐ เคนो เค—เคฏी เคเค• เคญी เคŸोเคชी เคจเคนीं เคฌिเค•ी । เคฆिเคจ เคขเคฒเคจे เคชเคฐ เคตเคน เคถเคนเคฐ เค•ी เค“เคฐ เคœाเคจे เคฒเค—ा । เคฐाเคธ्เคคे เคฎें เคเค• เคชेเฅœ เค•ी เค˜เคจी เค›ाเคต เคฆिเค–ी। เค‰เคธเคจे เค…เคชเคจे เคธाเคˆเค•िเคฒ เค•ो เคชेเฅœ เคธे เคฒเค—ाเคฏा เคคเคฅा เคช्เคฐเคšाเคฐ เค•े เคฒिเคฏे เคœो เคŸोเคชी เคชเคนเคจ เคฐเค–ा เคฅा เคตเคนी เคชเคนเคจे เคธो เค—เคฏा ।
เคฅเค•े เคนुเค เคŸोเคชी เคตिเค•्เคฐेเคคा เค•ो เคชेเฅœ เค•ी เค ंเคขी เค›ाเคตं เคฎें เคถीเค˜्เคฐ เคนी เคจींเคฆ เคฒเค— เค—เคฏी । เค‰เคธ เคชेเฅœ เคชเคฐ เค•ुเค› เคฌเคจ्เคฆเคฐ เคฌैเค े เคฅे । เคฌंเคฆเคฐों เคจे เค‰เคธ เคŸोเคชी เคตिเค•्เคฐेเคคा เค•ी เคคเคฐเคซ เคฌเฅœे เค—ौเคฐ เคธे เคฆेเค–ा । เคซिเคฐ เคชेเฅœ เคชเคฐ เคธे เคเค• เคฌเคจ्เคฆเคฐ เค‰เคคเคฐा เค”เคฐ เคธाเคˆเค•िเคฒ เค•ी เคนैंเคกเคฒ เคชเคฐ เคฐเค–ी เคŸोเคชी เค•ो เค‰เคคाเคฐเค•เคฐ เคชเคนเคจ เคฒिเคฏा เค”เคฐ เคชेเฅœ เคชเคฐ เคœा เคฌैเค ा । เค…เคฌ เค‰เคธ เคฌเคจ्เคฆเคฐ เค•ी เคฆेเค–ा เคฆेเค–ी เคเค• เคเค• เค•เคฐ เคธเคญी เคฌเคจ्เคฆเคฐ เค‰เคคเคฐเคคे เค”เคฐ เคŸोเค•เคฐी เคฎें เคเคฒเค• เคฐเคนी เคŸोเคชिเคฏों เคฎें เคธे เคเค• เคจिเค•ाเคฒเคคे เค”เคฐ เคชเคนเคจ เค•เคฐ เคชेเฅœ เคชเคฐ เคฌैเค  เคœाเคคे । เค‡เคธ เคคเคฐเคน เคŸोเคชी เคตिเค•्เคฐेเคคा เค•ी เคŸोเค•เคฐी เค–ाเคฒी เคชเฅœ เค—เคฏी। เคชेเฅœ เคชเคฐ เคเค• เคฌเคจ्เคฆเคฐ เคฌिเคจा เคŸोเคชी เค•े เคฐเคน เค—เคฏा เคฅा । เคตเคน เคฌเคจ्เคฆเคฐ เคญी เคจीเคšे เค‰เคคเคฐा เค”เคฐ เคซेเคฐीเคตाเคฒे เคตिเค•्เคฐेเคคा เค•े เคธिเคฐ เคธे เคŸोเคชी เค‰เคคाเคฐ เค•เคฐ เคชเคนเคจ เคฒिเคฏा เค”เคฐ เคชेเฅœ เคชเคฐ เคฌैเค  เค—เคฏा।
เค•ुเค› เคฆेเคฐ เคฌाเคฆ เคซेเคฐीเคตाเคฒा เคœเคฌ เคธเคฐ เค–ुเคœเคฒाเคคे เค‰เค ा เคคो เค‰เคธे เคฎเคนเคธूเคธ เคนुเค† เค•ी เค‰เคธเค•े เคธเคฐ เคชเคฐ เคŸोเคชी เคจเคนीं เคนै। เค‰เคธเคจे เคธाเคˆเค•िเคฒ เคชเคฐ เคฐเค–ी เค…เคชเคจी เคŸोเคชिเคฏों เค•ी เคคเคฐเคซ เคฆेเค–ा เคคो เคोเคฒी เค–ाเคฒी เคฅी। เคตเคน เค…เคค्เคฏंเคค เคšिंเคคिเคค เคนुเค† เค‡เคงเคฐ เค‰เคงเคฐ เคฆेเค–เคคे เคนुเค เค‰เคธเค•ी เคฆृเคท्เคŸि เคชेเฅœ เคชเคฐ เคฌैเค े เคฌंเคฆเคฐों เคชเคฐ เคชเฅœी เคตिเค•्เคฐेเคคा เคธ्เคคเคฌ्เคง เคฐเคน เค—เคฏा। เคตเคน เคฒाเคšाเคฐ เคฅा เคฌंเคฆเคฐों เคธे เคŸोเคชी เคฒे เคฒेเคจा เค•िเคธी เคญी เคช्เคฐเค•ाเคฐ เคธे เคธเคฎ्เคญเคต เคจเคนीं เคฅा।
เคตเคน เคจिเคฐाเคถ เคนोเค•เคฐ เคตเคนां เคธे เคœाเคจे เค•ी เคคैเคฏाเคฐी เค•เคฐเคจे เคฒเค—ा। เคคเคญी เคตเคนाँ เคธे เคเค• เคฌुเคœुเคฐ्เฅš เคต्เคฏเค•्เคคि เค—ुเคœเคฐ เคฐเคนे เคฅे।  เค‰เคจ्เคนोंเคจे เคŸोเคชी เคชเคนเคจ เคฐเค– เคฅी। เคชेเฅœ เคชเคฐ เคŸोเคชी เคชเคนเคจे เคฌैเค े เคฌंเคฆเคฐों เค•ो เคฆेเค– เค•เคฐ เค‰เคจ्เคนें เคนंเคธी เค†เคฏी। เคตो เค‰เคธ เคŸोเคชी เคตिเค•्เคฐेเคคा เค•े เคชाเคธ เคœाเค•เคฐ เค‡เคธเค•ा เคฐเคนเคธ्เคฏ เคœाเคจเคจा เคšाเคนे। เคŸोเคชी เคฌेเคšเคจे เคตाเคฒे เคจे เค‰เคจ्เคนें เคฌเคคाเคฏा เค•ी เคฏे เคธเคญी เคฌเคจ्เคฆเคฐ เคฎेเคฐे เคŸोเค•เคฐी เคธे เคŸोเคชी เคจिเค•ाเคฒ เคจिเค•ाเคฒ เคชเคนเคจ เคฒिเค เคนैं เคœเคฌ เคฎเคˆ เคธो เคฐเคนा เคฅा। เค”เคฐ เคคो เค”เคฐ เค‡เคจ เคฌंเคฆเคฐों เคจे เคฎेเคฐे เคธिเคฐ เคชเคฐ เคธे เคญी เคŸोเคชी เค‰เคคाเคฐ เคฐเค–ी เคนै।
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เคชंเคšเคคंเคค्เคฐ : เคเค—เฅœाเคฒू เคฌिเคฒ्เคฒिเคฏाँ เค”เคฐ เคงूเคฐ्เคค เคฌเคจ्เคฆเคฐ

           
                              पंचतंत्र

            झगड़ालू बिल्लियाँ और धूर्त बन्दर

एक जंगल में पेड़ के  नीचे दो बिल्लोयों ने घर बना  रखा था। जंगल किनारे एक समृद्ध गावं होने से बिल्लियां पास के  गांव से कभी कभी स्वादिष्ट भोजन लय करती थी।  उनके दिन अच्छे से कट रहे थे।  कभी कभी ग्रामीणों से नजर बचा के वो दूध दही का भी मजा चख लिया करती थी।  ग्रामीण लोगों के अनाज का भंडार उनके आहार का मुख्य स्रोत था। अनाज के भंडार के पास प्रचुर मात्र में चूहे पाए जाते थे। बिल्लियां उन चूहों का शिकार कर मजे से जीवन यापन करते थे। 
बिल्लियां जिस पेड़ के नीचे घर बन रखी थी उस पेड़ पर एक बन्दर का आवास था।  बन्दर भी अपने आहार के खोज में कभी कभी पास के गांव में जाया करता था। एक ही जगह आवास होने से और गांव के मार्ग में आते जाते मिलने से बन्दर और बिल्लियों में मित्रता हो गयी थी। इस मित्रता के नाते अब बिल्लियां जब कुछ अच्छा आहार मिलता जिसे बन्दर भी खा सकता था तो बिल्लिया उसे बन्दर के लिए लेते आती थीं।  बन्दर भी बिल्लियों का ख्याल रखता था और जब किसी घर की गृहस्वामिनी गृहकार्य में ब्यस्त होती थी , तो बिल्लियों की उस घर के दूध दही के बारे में ख़ुफ़िया जानकारी दे देता था। जिससे बिल्लियों का दूध दही का शिकार आसान हो जाता था। 
एक दिन बिल्लियां दूध दही के शिकार में एक ग्रामीण के घर में घुसी। वह उन्हें दूध ताहि तो नहीं मिला लेकिन घी में चुपड़ी हुए एक दिखने में अति स्वादिष्ट रोटी मिली।
एक रोटी अब कौन खाये कौन उपवास रहे। यदि दोनों खाये तो कौन कितना खाये इस पर बिल्लियों में विवाद हो गया। विवाद जब ज्यादा बढ़ गया तो बिल्लियों ने विचार किया की क्यों न हम इस विवाद को ऐसे मित्र से सुलझाने का प्रयास करने जो हम दोनों की हितैषी हो। यह विचार कर  बिल्लियां रोटी लिए बन्दर के पास  गयी। बन्दर ने बिल्लियों से पास के गांव से एक तराजू लाने को कहा।  झट से बिल्लिया गांव के बनिए से नजर बचा कर उसकी तराजू उठा लायी।

अब बन्दर ने रोटी में बिल्लियों के लिए हिस्सा लगाना शुरू किया। बन्दर ने रोटी को दो भाग में तोड़ा  और तराजू के दोनों पलड़ो पर रख दिया।  तराजू के दोनों पलड़ो पर आसमान रोटी का भार होने से तुला संतुलित नहीं था। तुला को संतुलित करने के लिए बन्दर अधिक वजन वाले रोटी के टुकड़े से रोटी तोडता  और अपने मुंह में रख लेता।  उसके ऐसा करने से दूसरा पलड़ा भारी हो जाता।  अब बन्दर इस पलड़े से रोटी के टुकड़े में से कुछ टुकड़े तोडता और खा लेता। ऐसा करते करते बन्दर सारी  रोटी के टुकड़े खा गया अब तराजू के पलड़े भी संतुलित थे। बिल्लियों के आपस में झगड़ने से बन्दर को लाभ हो गया और बिल्लियां रही। 

सीख :- जब  हम आपस में लड़ते हैं तो फ़ायदा हमें नहीं होता , हमारे आपस में कलह से दूसरे को लाभ हो जाता है। अतः छोटे छोटे लाभ के लिए हमें आपस में नहीं लड़ना चाहिए।

Thursday, 19 January 2017

เคชंเคšเคคंเคค्เคฐ : เคฌैเคฒ เค”เคฐ เคฎेเฅเค•

                       पंचतंत्र

                 बैल और मेढ़क 

एक बार एक तालाब के किनारे छोटे-छोटे मेढक खेल रहे थे। तभी वहाँ एक बैल पानी पीने के लिए आया। उसने पानी पीकर जोर से डकारा। बैल के डकारने की अवाज सुनकर सभी मेढक भयभीत हो गये। वे सरपट भागते हुए अपनी दादी माँ के पास पहुँचे।
दादी माँ ने अपने पोते से पूछा, क्यों रे, क्या हुआ? तुम लोग घबराए हुए क्यों हो?
छोटे मेढक ने कहा, अरे दादी, अभी एक बहुत बड़ा जानवर तालाब में पानी पीने आया था। उसकी आवाज बहुत ही तेज और भंयकर थी।
दादी माँ ने पूछा, कितना बड़ा था वह जानवर? नन्हे मेढक ने जवाब दिया, अरे, बहुत ही बड़ा था वह। दादी माँ ने अपने चारो पैर फैलाकर और गाल फुलाकर कहा, वह इतना बड़ा था, क्या? 
छोटे मेढक ने कहा, अरे नही दादी वह इससे भी बहुत बड़ा था। दादी माँ दादी ने फिर गाल पेट फुलाकर कहा इससे बड़ा तो नही होगा। है न!
नन्हे मेढक नें जवाब दिया, नही दादी वह इससे भी बहुत बहुत बड़ा था। दादी माँ ने अपने शारीर को और फुलाया। इस प्रकार वह अपने शरीर को फुलाती गई। आखिरकार उसका पेट फट गया और वह मर गई।

शिक्षा -थोथा अभिमान विनाश का कारण होता है।

Wednesday, 18 January 2017

เคชंเคšเคคंเคค्เคฐ : เคŸिเคก्เคกा เค”เคฐ เคšींเคŸी

                         पंचतंत्र

                   टिड्डा और चींटी

गर्मियों के दिन थे। खुली धूप थी और मौसम साफ था। अनाज भी भरपूर था। ऐसे समय पर एक टिड्डा भरपेट खाना खाकर गीत गाने में मस्त था। उसने देखा, कुछ चींटियाँ खाने की सामग्री ले जा रही हैं। शायद वे भविष्य के लिए संग्रह कर रही थीं। चींटियों को देखकर वह हँसने लगा। उनमे से एक चींटी से उसकी दोस्ती थी। टिड्डे ने उस चींटी से कहा, "तुम सब कितनी लालची हो! इस खुशी के मौके पर भी काम कर रही हो! तरस आता है तुम पर!" चींटी ने जवाब दिया, "अरे भाई, हम लोग बरसात के लिए खाने की सामग्री एकत्र कर रही हैं।"
गर्मियों के बाद बरसात का मौसम शुरू हुआ। आकाश में बादल छा गए। खुली धूप जाती रही! अब टिड्डे के लिए भोजन जुटाना मुश्किल हो गया। आखिरकार उसके सामने भूखों मरने की समस्या खड़ी हो गई। 
एक दिन टिड्डे ने अपनी दोस्त चींटी का दरवाजा खटखटाया। उसने कहा, "चींटी बहन कृपा कर मुझे कुछ खाने के लिए दो। मैं बहुत भूखा हूँ।" चींटी ने जवाब दिया, "गर्मी के दिनों में तो तुम गीत में मगन होकर इधर-उधर घूमते रहे, अब बरसात के मौसम में कही जाकर नाचो। तुम जैसे आलसी को मैं एक भी दाना नहीं दे सकती।" और उसने झट से दरवाजा बंद कर दिया।

शिक्षा -आज की बचत ही कल काम आती है।

Story Time : เคฒเค•เฅœเคนाเคฐा เค”เคฐ เคฆेเคตเคฆूเคค

     
                  लकड़हारा और देवदूत

एक लकड़हारा था। एक बार वह नदी के किनारे एक पेड़ से लकड़ी काट रहा था। एकाएक उसके हाथ से कुल्हाड़ी छूटकर नदी मे गिर पड़ी। नदी गहरी थी। उसका प्रवाह भी तेज था। लकड़हारे ने नदी से कुल्हाड़ी निकालने की बहुत कोशिश की पर वह उसे नही मिली इससे लकड़हारा बहुत दुखी हो गया। इतने देवदूत मेवहाँ से गुजरा लकड़हारे को मुँह लटकाए खड़ा देख कर उसे दया आ गई। वह लकड़हारे के पास आया और बोला चिंता मत करो। मैं नदी से तुम्हारी कुल्हाड़ी अभी निकाल देता हूँ। यह कहकर देवदूत नदी मे कूद पड़ा देवदूत पानी से निकला तो उसके हाथ मे सोने की कुल्हाड़ी थी। वह लकड़हारे को सोने की कुल्हाड़ी देने लगा। तो लकड़हारे ने कहा,"नही नही यह कुल्हाड़ी मेरी नही है। मैं इसे नही ले सकता।"
देवदूत ने फिर नदी में डुबकी लगाई इसबार वह चाँदी की कुल्हाड़ी लेकर बाहर आया ईमानदार लकड़हारे ने कहा, "यह कुल्हाड़ी मेरी नही है। 
देवदूत ने तीसरी बार पानी मे डुबकी लगाई इस बार वह एक साधारण सी लोहे की कुल्हाड़ी लेकर बाहर आया।
हाँ यह मेरी कुल्हाड़ी है। लकड़हारे ने खुश होकर कहा।
उस गरीब की ईमानदारी देखकर देवदूत बहुत प्रसन्न हुआ। उसने लकड़हारे को उसकी लोहे की कुल्हाड़ी दे दी। साथ ही उसने सोने और चाँदी की कुल्हाडि़याँ भी उसे पुरस्कार के रूप मे दे दीं।

शिक्षा -ईमानदारी से बढ़कर कोई चीज नही।

Tuesday, 17 January 2017

เค•เคฅा เคธाเค—เคฐ : เคฒเคชเคธी เค”เคฐ เคคเคชเคธी เค•ी เค•เคนाเคจी

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                       เคฒเคชเคธी เคคเคชเคธी เค•ी เค•เคฅा
                              เค•เคฅा เคธाเค—เคฐ

เคเค•  เคฒเคชเคธी เคฅा , เคเค• เคคเคชเคธी เคฅा। เคคเคชเคธी เคนเคฎेเคถा เคญเค—เคตाเคจ เค•ी เคคเคชเคธ्เคฏा เคฎें เคฒीเคจ เคฐเคนเคคा เคฅा। เคฒเคชเคธी เคฐोเคœाเคจा เคธเคตा เคธेเคฐ เค•ी เคฒाเคชเคธी เคฌเคจाเค•เคฐ เคญเค—เคตाเคจ เค•ा เคญोเค— เคฒเค—ा เค•เคฐ เคœीเคฎ เคฒेเคคा เคฅा।
เคเค• เคฆिเคจ เคฆोเคจों เคฒเฅœเคจे เคฒเค—े। เคคเคชเคธी เคฌोเคฒा เคฎै เคฐोเคœ เคญเค—เคตाเคจ เค•ी เคคเคชเคธ्เคฏा เค•เคฐเคคा เคนूँ เค‡เคธเคฒिเค เคฎै เคฌเฅœा เคนूँ।  
เคฒเคชเคธी เคฌोเคฒा เคฎै เคฐोเคœ เคญเค—เคตाเคจ เค•ो เคธเคตा เคธेเคฐ เคฒाเคชเคธी เค•ा เคญोเค— เคฒเค—ाเคคा เคนूँ เค‡เคธเคฒिเค เคฎै เคฌเฅœा ।
เคจाเคฐเคฆ เคœी เคตเคนाँ เคธे เค—ुเคœเคฐ เคฐเคนे เคฅे। เคฆोเคจों เค•ो เคฒเฅœเคคा เคฆेเค–เค•เคฐ เค‰เคจเคธे เคชूเค›ा เค•ि เคคुเคฎ เค•्เคฏों เคฒเฅœ เคฐเคนे เคนो ?
เคคเคชเคธी เคจे เค–ुเคฆ เค•े เคฌเฅœा เคนोเคจे เค•ा เค•ाเคฐเคฃ เคฌเคคाเคฏा เค”เคฐ เคฒเคชเคธी เคจे เค…เคชเคจा เค•ाเคฐเคฃ เคฌเคคाเคฏा । เคจाเคฐเคฆ เคœी เคฌोเคฒे เคคुเคฎ्เคนाเคฐा เคซैเคธเคฒा เคฎै เค•เคฐ เคฆूंเค—ा ।
เคฆूเคธเคฐे เคฆिเคจ เคฒเคชเคธी เค”เคฐ เคคเคชเคธी เคจเคนा เค•เคฐ เค…เคชเคจी เคฐोเคœ เค•ी เคญเค•्เคคि เค•เคฐเคจे เค†เคฏे  เคคो เคจाเคฐเคฆ เคœी เคจे เค›ुเคช เค•เคฐเค•े เคธเคตा เค•เคฐोเฅœ เค•ी เคเค• เคเค• เค…ंเค—ूเค ी เค‰เคจ เคฆोเคจों เค•े เค†เค—े
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เคคเคชเคธी เค•ी เคจเคœเคฐ เคœเคฌ  เค…ंเค—ूเค ी เคชเคฐ เคชเฅœी เคคो เค‰เคธเคจे เคšुเคชเคšाเคช เค…ंเค—ूเค ी เค‰เค ा เค•เคฐ เค…เคชเคจे เคจीเคšे เคฆเคฌा เคฒी। เคฒเคชเคธी เค•ी เคจเคœเคฐ เค…ंเค—ूเค ी เคชเคฐ เคชเฅœी เคฒेเค•िเคจ เค‰เคธเคจे เคง्เคฏाเคจ เคจเคนी เคฆिเคฏा เคญเค—เคตाเคจ เค•ो เคญोเค— เคฒเค—ाเค•เคฐ เคฒाเคชเคธी เค–ाเคจे เคฒเค—ा।
เคจाเคฐเคฆ เคœी เคธाเคฎเคจे เค†เคฏे เคคो เคฆोเคจों เคจे เคชूเค›ा เค•ि เค•ौเคจ เคฌเฅœा เคคो เคจाเคฐเคฆ เคœी เคจे เคคเคชเคธी เคธे เค–เฅœा เคนोเคจे เค•ो เค•เคนा। เคตो เค–เฅœा เคนुเค† เคคो เค‰เคธเค•े เคจीเคšे เคฆเคฌी เค…ंเค—ूเค ी เคฆिเค–ाเคˆ เคชเฅœी।
 เคจाเคฐเคฆ เคœी เคจे เคคเคชเคธी เคธे เค•เคนा เคคเคชเคธ्เคฏा เค•เคฐเคจे เค•े เคฌाเคฆ เคญी เคคुเคฎ्เคนाเคฐी เคšोเคฐी เค•เคฐเคจे เค•ी เค†เคฆเคค เคจเคนीं เค—เคฏी। เค‡เคธเคฒिเค เคฒเคชเคธी เคฌเฅœा เคนै।

เคธเคญी เคต्เคฐเคค เคเคตं เคค्เคฏोเคนाเคฐों เคฎें เค‡เคธ เค•เคฅा เค•ा เคฌเคนुเคค เคฎเคนเคค्เคต เคนै। เค•ाเคฐ्เคคिเค• เคชूเคฐ्เคฃिเคฎा เคชเคฐ เคฏเคน เค•เคฅा เค…เคค्เคฏเคงिเค• เคซเคฒเคฆाเคฏी เคฎाเคจी เคœाเคคी เคนै।
 

Monday, 16 January 2017

Story Time : เคจเคฎเค• เค•ा เคต्เคฏाเคชाเคฐी เค”เคฐ เค—เคงा

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                 เคจเคฎเค• เค•ा เคต्เคฏाเคชाเคฐी เค”เคฐ เค—เคงा


เคจเคฎเค• เค•े เคเค• เคต्เคฏाเคชाเคฐी เค•े เคชाเคธ เคเค• เค—เคงा เคฅा। เคตเคน เคต्เคฏाเคชाเคฐी เคฐोเคœ เคธुเคฌเคน เค…เคชเคจे เค—เคงे เคชเคฐ เคจเคฎเค• เค•ी เคฌोเคฐिเคฏाँ เคฒाเคฆเค•เคฐ เค†เคธ เคชाเคธ เค•े เค—ाँเคตो เคฎे เคจเคฎเค• เคฌेเคšเคจे เคฒे เคœाเคฏा เค•เคฐเคคा เคฅा। 
เค†เคธเคชाเคธ เค•े เค—ाँเคตो เคฎें เคœाเคจे เค•े เคฒिเค เค‰เคธे เค•เคˆ เคจाเคฒे เค”เคฐ เค›ोเคŸी-เค›ोเคŸी เคจเคฆिเคฏाँ เคชाเคฐ เค•เคฐเคจी เคชเคก़เคคी เคฅीं। เคเค• เคฆिเคจ เคจเคฆी เคชाเคฐ เค•เคฐเคคे เคธเคฎเคฏ เค—เคงा เค…เคšाเคจเค• เคชाเคจी เคฎें เค—िเคฐ เคชเคก़ा เค‡เคธเคธे เค—เคงे เค•े เคถเคฐीเคฐ เคชเคฐ เคฒเคฆा เคนुเค† เคขेเคฐ-เคธाเคฐा เคจเคฎเค• เคชाเคจी เคฎें เค˜ुเคฒ เค—เคฏा เค…เคฌ เค—เคงे เค•ा เคฌोเค เค•ाเคซी เคนเคฒ्เค•ा เคนो เค—เคฏा। เค‰เคธ เคฆिเคจ เค—เคงे เค•ो เค…เคš्เค›ा เค†เคฐाเคฎ เคฎिเคฒ เค—เคฏा।
เคฆूเคธเคฐे เคฆिเคจ เคตเคน เคต्เคฏाเคชाเคฐी เคฐोเคœ เค•ी เคคเคฐเคน เค—เคงे เคชเคฐ เคจเคฎเค• เค•ी เคฌोเคฐिเคฏाँ เคฒाเคฆ เค•เคฐ เคจเคฎเค• เคฌेเคšเคจे เคจिเค•เคฒा। เค‰เคธ เคฆिเคจ เคชเคนเคฒे เคจाเคฒे เค•ो เคชाเคฐ เค•เคฐเคคे เคธเคฎเคฏ เค—เคงा เคœाเคจเคฌूเค เค•เคฐ เคชाเคจी เคฎे เคฌैเค  เค—เคฏा। 
เค‰เคธเค•ी เคชीเค  เค•ा เคฌोเค เคซिเคฐ เคนเคฒ्เค•ा เคนो เค—เคฏा। เคต्เคฏाเคชाเคฐी เค‰เคธ เคฆिเคจ เคญी เค—เคงे เค•ो เคฒेเค•เคฐ เคตाเคชเคธ เคฒौเคŸ เค†เคฏा। เคชเคฐ เคจเคฎเค• เค•े เคต्เคฏाเคชाเคฐी เค•े เคง्เคฏाเคจ เคฎे เค† เค—เคฏा เค•ि เค†เคœ เค—เคงा เคœाเคจเคฌूเคเค•เคฐ เคชाเคจी เคฎे เคฌैเค  เค—เคฏा เคฅा। เค‰เคธे เค—เคงे เคชเคฐ เคฌเคนुเคค เค—ुเคธ्เคธा เค†เคฏा। เค‰เคธเคจे เค—เคงे เค•ो เคธเคฌเค• เคธिเค–ाเคจे เค•ा เคธंเค•เคฒ्เคช เคฒे เคฒिเคฏा।
เค…เค—เคฒे เคฆिเคจ เคต्เคฏाเคชाเคฐी เคจे เค—เคงे เคชเคฐ เคฐूเคˆ เค•े เคฌोเคฐे เคฒाเคฆे เค—เคงे เคจे เคซिเคฐ เคตเคนी เคคเคฐเค•ीเคฌ เค†เคœเคฎाเคจे เค•ी เค•ोเคถिเคถ เค•ी, เคจाเคฒा เค†เคคे เคนी เคตเคน เคชाเคจी เคฎे เคฌैเค  เค—เคฏा। เค‡เคธ เคฌाเคฐ เค‰เคฒ्เคŸा เคนी เคนुเค†। เคฐूเคˆ เค•े เคฌोเคฐो เคจे เค–ूเคฌ เคชाเคจी เคธोเค–ा เค”เคฐ เค—เคงे เค•ी เคชीเค  เค•ा เคฌोเค เคชเคนเคฒे เคธे เค•เคˆ เค—ुเคจा เคฌเคข़ เค—เคฏा। เคชाเคจी เคธे เคฌाเคนเคฐ เค†เคจे เคฎे เค—เคงे เค•ो เค–ूเคฌ เคฎेเคนเคจเคค เค•เคฐเคจी เคชเคก़ी।
เค—เคงा เค…เคชเคจी เค•เคฐเคจी เคชเคฐ เคฌเคนुเคค เคชเค›เคคाเคฏा। เค‰เคธ เคฆिเคจ เค•े เคฌाเคฆ เคธे เค—เคงे เคจे เคชाเคจी เคฎे เคฌैเค เคจे เค•ी เค†เคฆเคค เค›ोंเคก เคฆी। 

เคถिเค•्เคทा -เคฎूเคฐ्เค– เคธเคฌเค• เคธिเค–ाเคจे เคธे เคนी เค•ाเคฌू เคฎें เค†เคคे เคนै।

Sunday, 15 January 2017

เค•เคฅा เคธाเค—เคฐ : เคฎเค•เคฐ เคธंเค•्เคฐांเคคी เค•ी เค•เคฅाเคँ

                     मकर संक्रांति की कथाएँ

                         तिल दान की कथा
                                  (1)

कहा जाता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाया करते हैं। शनिदेव चूंकि मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। कथा कुछ इस प्रकार है ..

शन‌ि महाराज का अपने प‌िता से वैर भाव था क्योंक‌ि सूर्य देव ने उनकी माता छाया को अपनी दूसरी पत्नी संज्ञा के पुत्र यमराज से भेद-भाव करते देख ल‌िया था, इससे नाराज होकर सूर्य देव ने संज्ञा और उनके पुत्र शन‌ि को अपने से अलग कर द‌िया था. इससे शन‌ि और छाया ने सूर्य देव को कुष्ठ रोग का शाप दे द‌िया.

पिता सूर्यदेव को कुष्ट रोग से पीड़‌ित देखकर यमराज ने तपस्या क‌िया और सूर्यदेव को कुष्ठ रोग से मुक्त करवा ‌द‌िया. लेक‌िन सूर्य ने क्रोध‌ित होकर शन‌ि महाराज के घर कुंभ ज‌िसे शन‌ि की राश‌ि कहा जाता है उसे जला द‌िया. इससे शन‌ि और उनकी माता छाया को कष्ट भोगना पड़ रहा था. यमराज ने अपनी सौतली माता और भाई शनि को कष्ट में देखकर उनके कल्याण के लिए पिता सूर्य को काफी समझाया तब जाकर सूर्य देव शनि के घर कुंभ में पहुंचे. कुंभ राश‌ि में सब कुछ जला हुआ था. उस समय शनि देव के पास तिल के अलावा कुछ नहीं था, इसलिए उन्होंने काले तिल से सूर्य देव की पूजा की.

शनि देव की पूजा से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने शनि महाराज को आशीर्वाद दिया कि जो भी व्यक्ति मकर संक्राति के दिन काले तिल से सूर्य की पूजा करेगा उसके सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाएंगे. इस दिन तिल से सूर्य पूजा करने पर आरोग्य सुख में वृद्धि होती. शनि के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं तथा आर्थिक उन्नति होती है.

                      खिचड़ी दान की कथा
                                   (2)

मकर संक्रांत‌ि के द‌िन ख‌िचड़ी दान और खान की परंपरा के पीछे भगवान श‌िव के अवतार कहे जाने वाले बाबा गोरखनाथ की कहानी है. खिलजी के आक्रमण के समय नाथ योगियों को खिलजी से संघर्ष के कारण भोजन बनाने का समय नहीं मिल पाता था. इससे योगी अक्सर भूखे रह जाते थे और कमजोर हो रहे थे.

 इस समस्या का हल निकालने के लिए बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जी को एक साथ पकाने की सलाह दी. यह व्यंजन काफी पौष्टिक और स्वादिष्ट था. इससे शरीर को तुरंत उर्जा मिलती थी. नाथ योगियों को यह व्यंजन काफी पसंद आया. बाबा गोरखनाथ ने इस व्यंजन का नाम खिचड़ी रखा. गोरखपुर स्थिति बाबा गोरखनाथ के मंदिर के पास मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी मेला आरंभ होता है. कई दिनों तक चलने वाले इस मेले में बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है और इसे भी प्रसाद रूप में वितरित किया जाता है.

ख‌िचड़ी दान और भोजन के पीछे एक कारण यह है क‌ि संक्रांत‌ि के समय नया चावल तैयार हो जाता है. माना जाता है क‌ि सूर्य देव ही सभी अन्न को पकाते हैं और उन्हें पोष‌ित करते हैं इस‌ल‌िए आभार व्यक्त करने के ल‌िए सूर्य देव को गुड़ से बनी खीर या ख‌िचड़ी अर्प‌ित करते हैं. वैसे मकर संक्रांत‌ि के द‌िन बनाई जाने वाली ख‌िचड़ी में उड़द का दाल प्रयोग क‌िया जाता है जो शन‌ि से संबंध‌ित है. कहते हैं इस द‌िन व‌िशेष ख‌िचड़ी को खाने से शन‌ि का कोप दूर होता है. इसल‌िए ख‌िचड़ी खाने की परंपरा है.

एक अन्य कथा के अनुसार एक धनिक से अंतिम समय जब यमदूत ने नरकागमन की बात कही तो वह डर गया। उसने धन दे कर स्वर्ग जाने की मांग की । यमदूत यह सुन कर हँसने लगा । यमदूत न कहा तुमने कभी किसी को कोई दान नहीं किया यदी किया होता तो आज तुम्हारे पूण्य तुम्हें स्वर्ग ले जाते । धन से स्वर्ग की प्राप्ती नहीं होती । उसके लिये अच्छे कर्म जरूरी होते हैं। यह सुनकर धनिक ने अंतिम समय दान की इक्छा प्रकट की । यमदूत ने मात्र 2 घड़ी का समय दिया। इतने कम समय में उसे खिचड़ी दिखी उसने वही उठा उठा कर खुले हाथों से दान की एवं सभी से कहा हम कुछ भी लेकर जाने वाले नहीं हैं । सिर्फ पुण्य ही हमारे साथ हमेसा रहेंगे अतः हमेसा दान पुण्य करते रहना ।
उस दिन संक्रांत का दिन था तभी से संक्रांत के दिन दान पुण्य का विशेष महत्त्व है और लोग खिचड़ी का भी दान करते हैं ।

                      गंगा सागर की कथा
                               (3)

मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा उनसे मिली थीं। यह भी कहा जाता है कि गंगा को धरती पर लाने वाले महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था। उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद इस दिन गंगा समुद्र में जाकर मिल गई थी। इसलिए मकर संक्रांति पर गंगा सागर में मेला लगता है।
   

                      भीष्म पितामह की कथा
                                     (४)
 
महाभारत काल के महान योद्धा भीष्म पितामह ने भी अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था।
कुरुक्षेत्र के ब्रह्म सरोवर में स्नान को भी पवित्र माना जाता है। कहा जाता है कि भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। युद्ध समाप्ति के बाद जब भीष्म सर सैय्या पर लेटे हुए थे, तो भगवान श्री कृष्ण सहित सभी पांडव व अनेक ऋषि मुनि उनसे मिलने आए। धर्म-कर्म व भगवान श्री कृष्ण के बारे में भीष्म ने विस्तार से पांडवों को बताया। तभी सूर्य दक्षिणायन से उतरायण में प्रवेश कर रहे थे। भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करते हुए मकर संक्रांति के दिन ही भीष्म पितामह ने अपने प्राण त्यागे थे। हरियाणा में तो इस दिन को तभी से रूठों व बड़े-बुजूर्गों को मनाने व उनका आशीर्वाद पाने के दिन के रुप में मनाया जाता है व कुरुक्षेत्र के सरोवरों में पवित्र स्नान कर पिंडदान भी किया जाता है।

          मकर संक्रांति खरमास की समाप्ति

मकर संक्रांति खरमास की समाप्ति पर मनाया जाने वाला त्योहार है. इस दिन स्नान दान का विशेष महत्व । नदियों,सरोवरो और पुण्य क्षेत्रों पर श्रद्धालुओं की  भारी भीड़ लग जाति है ।

                     खरमास की कथा
                               (5)

सूर्य  एक राशि में एक महीने रहता है । सूर्य जब धनु राशि में होता है तो वह महीना खरमास का महीना होता है । 14 दिसम्बर से लेकर  14 जनवरी तक होता है । इस एक महीने में कोई भी शुभ कार्य नही होता । इस महीने को खरमास कहा कहे जाने के बारे में एक पौराणिक कथा प्रचलित है।

प्रकृति के नियम के अनुसार सूर्य को निरंतर चलते रहना है। निरंतर चलते चलते एक दिन सूर्य के घोड़ों को प्यास लग गयी प्यास से ब्याकुल घोड़े पानी के लिए तड़प रहे थे।  सूर्य मार्ग में एक तालाब देख अपने घोड़ों को पानी पिलाने लगे। एक एक कर सभी घोडों को रथ से खोल कर पानी पिलाने लगे। तभी सूर्य को इस बात का स्मरण हुआ की ईश्वर के विधान के अनुसार सृष्टि को सुचारू रूप से चलने के लिए सूर्य का निरंतर चलते रहना जरुरी है। सूर्य ने तुरंत तालाब के किनारे चर रहे गधों को रथ में जोड़कर रथ को हांक देने का  आदेश दिया। इस तरह खर मतलब गधे की सवारी कर सूर्य एक माह चलते रहे। खर से जुड़े रथ से चलने के कारण यह महीना खर मास के नाम से जाना जाता है। 

               कुछ अन्य तथ्य एवं मान्यताएँ

इस त्यौहार को अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग नाम से मनाया जाता है। मकर संक्रांति को तमिलनाडु में पोंगल के रूप में तो आंध्रप्रदेश, कर्नाटक व केरला में यह पर्व केवल संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है।

इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी व सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। इस प्रकार यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है।

यशोदा जी ने जब कृष्ण जन्म के लिए व्रत किया था तब सूर्य देवता उत्तरायण काल में पदार्पण कर रहे थे और उस दिन मकर संक्रांति थी। कहा जाता है तभी से मकर संक्रांति व्रत का प्रचलन हुआ।